भारत में महंगाई हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति का सबसे प्रभावशाली हथियार बन गई है। रसोई गैस की बढ़ती कीमतों से लेकर पेट्रोल-डीजल, सब्जियों, दालों और स्कूल फीस तक, हर बढ़ता खर्च सीधे आम आदमी की जिंदगी को प्रभावित करता है। यही कारण है कि जैसे ही महंगाई बढ़ती है, राजनीतिक दल इसे जनता की भावनाओं से जोड़कर अपने-अपने तरीके से भुनाने लगते हैं। सत्ता पक्ष वैश्विक परिस्थितियों, युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकटों का हवाला देता है, जबकि विपक्ष इसे सरकार की नाकामी और जनविरोधी नीतियों का परिणाम बताता है। लेकिन इस पूरे राजनीतिक शोर के बीच सबसे बड़ा सवाल यही रह जाता है कि आखिर महंगाई पर राजनीति ज्यादा और समाधान कम क्यों दिखाई देता है?
असल में महंगाई का राजनीतिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह हर वर्ग को प्रभावित करती है। बेरोजगारी या आर्थिक मंदी जैसी समस्याओं का असर अलग-अलग स्तर पर महसूस होता है, लेकिन महंगाई सीधे हर घर की रसोई तक पहुंचती है। जब टमाटर सौ रुपये किलो होता है, रसोई गैस का सिलेंडर हजार रुपये पार करता है या दूध और दाल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तब जनता की नाराजगी स्वाभाविक रूप से सरकार की ओर मुड़ती है। राजनीतिक दल इस मनोविज्ञान को भलीभांति समझते हैं। यही कारण है कि चुनावों के दौरान महंगाई अचानक सबसे बड़ा मुद्दा बन जाती है, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक भाषणों के पीछे दब जाता है।
भारत की राजनीति में महंगाई का इतिहास भी काफी दिलचस्प रहा है। एक समय प्याज की बढ़ती कीमतों ने सरकारों को संकट में डाल दिया था। कई चुनावों में रसोई गैस और पेट्रोल की कीमतें निर्णायक मुद्दा बनीं। विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल महंगाई के खिलाफ सड़कों पर उतरते हैं, सिलेंडर लेकर प्रदर्शन करते हैं, जनता के बीच सरकार की आलोचना करते हैं और राहत देने के बड़े वादे करते हैं। लेकिन सत्ता में आते ही वही दल आर्थिक मजबूरियों का हवाला देने लगते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल नीतियों की नहीं, बल्कि राजनीतिक प्राथमिकताओं की भी है।
अवनीश कुमार गुप्ता
साहित्यकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार