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खेती और सौर ऊर्जा का संगम, ग्रामीण रोजगार को मिलेगी नई रफ्तार

केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि सौर पैनलों की स्थापना वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए। उनकी ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और खेतों में कृषि मशीनों की आवाजाही को ध्यान में रखकर डिजाइन तैयार किया जाए। इससे किसान अपनी जरूरत के अनुसार फसलों का चयन कर सकेंगे और जुताई, बुवाई तथा कटाई जैसे काम सामान्य रूप से कर पाएंगे। उन्होंने वर्षा जल के उचित निकास, जल संरक्षण और मिट्टी के कटाव को रोकने के उपायों को भी परियोजनाओं का अनिवार्य हिस्सा....

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  • October 21, 2026 7:00 pm IST, Published 32 minutes ago

नई दिल्ली: खेती और सौर ऊर्जा को एक साथ जोड़कर किसानों की आमदनी बढ़ाने तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दिशा में एग्रीवोल्टाइक तकनीक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसी उद्देश्य के साथ नई दिल्ली के भारत मंडपम में सातवें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस का शुभारंभ हुआ। तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के बेहतर समन्वय पर जोर दिया। सम्मेलन में देश-विदेश के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और किसानों ने भाग लिया।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में कृषि और सौर ऊर्जा का एकीकृत मॉडल किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है। एग्रीवोल्टाइक व्यवस्था के तहत खेतों में ऊंचाई पर सौर पैनल लगाए जाते हैं, जबकि उनके नीचे उपयुक्त फसलों की खेती जारी रखी जाती है। इससे एक ही जमीन का इस्तेमाल खाद्यान्न उत्पादन और बिजली बनाने, दोनों कार्यों के लिए किया जा सकता है। उनके मुताबिक, यह व्यवस्था किसानों को खेती के साथ अतिरिक्त आय का अवसर दे सकती है और देश की स्वच्छ ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी योगदान दे सकती है।

चौहान ने कहा कि भारत की कृषि व्यवस्था में छोटे और सीमांत किसानों की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। ऐसे में एग्रीवोल्टाइक से जुड़ी नीतियां बनाते समय उनकी जरूरतों और आर्थिक क्षमताओं को प्राथमिकता देना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि देश में औसत कृषि जोत लगभग 0.96 हेक्टेयर है और करीब 85 प्रतिशत किसान छोटे तथा सीमांत श्रेणी में आते हैं। इसलिए ऐसी तकनीक विकसित करने की जरूरत है, जिसे अपनाने के लिए किसानों को अपनी जमीन का बड़ा हिस्सा खेती से अलग न करना पड़े और उन पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव भी न आए।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि सौर पैनलों की स्थापना वैज्ञानिक तरीके से होनी चाहिए। उनकी ऊंचाई, खंभों के बीच की दूरी और खेतों में कृषि मशीनों की आवाजाही को ध्यान में रखकर डिजाइन तैयार किया जाए। इससे किसान अपनी जरूरत के अनुसार फसलों का चयन कर सकेंगे और जुताई, बुवाई तथा कटाई जैसे काम सामान्य रूप से कर पाएंगे। उन्होंने वर्षा जल के उचित निकास, जल संरक्षण और मिट्टी के कटाव को रोकने के उपायों को भी परियोजनाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाने की आवश्यकता बताई।

चौहान के अनुसार, एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में बिजली की खरीद, ग्रिड तक पहुंच और किसानों को भुगतान की व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए। किसान उत्पादक संगठनों को इन योजनाओं से जोड़ने के साथ ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को सौर उपकरणों के संचालन, मरम्मत और रखरखाव का प्रशिक्षण दिया जा सकता है। इससे गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय स्तर पर तकनीकी कौशल का विकास होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई कंपनी परियोजना बीच में छोड़ती है या अनुबंध पूरा होने पर सौर पैनल हटाने की स्थिति बनती है, तो उसका आर्थिक बोझ किसान पर नहीं पड़ना चाहिए।

सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भारत की बढ़ती ऊर्जा क्षमता और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में हुई प्रगति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि देश की कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 560 गीगावाट से अधिक हो चुकी है, जबकि गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की स्थापित क्षमता 308 गीगावाट के पार पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि सौर और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के विस्तार से बिजली उत्पादन की लागत कम करने तथा ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बनाने में मदद मिली है।

जोशी ने टेरी के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि भारत की कृषि भूमि का एक बड़ा हिस्सा एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त हो सकता है। उनके अनुसार, लगभग 4.75 करोड़ हेक्टेयर भूमि में इस मॉडल की संभावनाएं मौजूद हैं। यदि उपयुक्त जमीन के सीमित हिस्से पर भी योजनाबद्ध तरीके से ऐसी परियोजनाएं विकसित की जाएं, तो भविष्य में देश की बिजली जरूरतों को पूरा करने में इनका बड़ा योगदान हो सकता है। हालांकि, परियोजनाओं की सफलता के लिए स्थानीय जलवायु, मिट्टी, फसल और किसानों की जरूरतों के अनुरूप तकनीक चुनना जरूरी होगा।

केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान यानी पीएम-कुसुम योजना का उल्लेख करते हुए बताया कि अब तक लगभग 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ने की दिशा में प्रगति हुई है। उन्होंने घोषणा की कि योजना के अगले चरण में बड़े स्तर पर एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी है। इस पहल से कृषि क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा मिलने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है। उपलब्ध अध्ययनों के अनुसार, इस क्षेत्र में लगभग 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार सृजित होने की संभावना जताई गई है।

कार्यक्रम में कई वरिष्ठ अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया। उद्घाटन सत्र के दौरान एग्रीवोल्टाइक तकनीक से संबंधित तकनीकी उपकरणों और जागरूकता सामग्री का विमोचन किया गया। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य खेती और ऊर्जा उत्पादन के बीच ऐसा संतुलन विकसित करना है, जिससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित न हो, किसानों को अतिरिक्त आय मिले और भारत की स्वच्छ ऊर्जा संबंधी महत्वाकांक्षाओं को गति मिले। विशेषज्ञों के अनुसार, उचित नीतियों, वित्तीय सहायता और वैज्ञानिक योजना के साथ एग्रीवोल्टाइक भारतीय कृषि के लिए एक उपयोगी विकल्प बन सकता है।

 

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