जदयू के संविधान के मुताबिक, अनुशासनहीनता के शुरुआती प्रमाण मिलने पर राष्ट्रीय परिषद किसी सदस्य को निलंबित कर सकती है। वहीं, राज्य इकाई का अध्यक्ष अपनी राज्य इकाई के अधीन आने वाले सदस्यों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई कर सकता है। हालांकि, संविधान में विधायक, सांसद या राष्ट्रीय परिषद के सदस्य के मामले में प्रदेश अध्यक्ष की शक्तियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसी आधार पर अनंत सिंह के मामले में जारी आदेश की प्रक्रिया पर चर्चा हो रही है।
पार्टी संविधान की धारा 19 में अनुशासन भंग करने से जुड़ी परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है। इसके तहत पार्टी के फैसलों के खिलाफ काम करना, सक्षम पदाधिकारी के निर्देशों की अवहेलना करना, संगठन के नियमों का उल्लंघन करना और पार्टी के नेताओं या इकाइयों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से प्रचार करना अनुशासनहीनता के दायरे में आ सकता है।
अनंत सिंह पर आरोप है कि उन्होंने विधान परिषद चुनाव के दौरान पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जनसुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह का समर्थन किया था। उन्होंने दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार भी किया और जदयू के उम्मीदवार के खिलाफ सार्वजनिक बयान दिए। इसके अलावा पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की ओर से सार्वजनिक बयानबाजी से बचने की सलाह दिए जाने के बावजूद उन्होंने अपनी बात रखी। पार्टी के फैसले के विपरीत गतिविधियों को ही उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार बताया जा रहा है।
इस मामले में राष्ट्रीय जनता दल ने भी जदयू पर निशाना साधा है। राजद के मुख्य प्रवक्ता शक्ति यादव ने कार्रवाई को संविधान के अनुरूप नहीं बताते हुए सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि आदेश में राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्णय का उल्लेख नहीं है और प्रदेश अध्यक्ष की ओर से लिया गया फैसला प्रक्रियागत रूप से उचित नहीं दिखता। हालांकि, जदयू से जुड़े सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने राज्य इकाई को मामले में निर्णय लेने के लिए अधिकृत किया था। इसी आधार पर पार्टी की कार्रवाई को सही ठहराया जा रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अनंत सिंह ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जदयू से निकाले जाने से उन्हें कोई खास फर्क नहीं पड़ता और जरूरत पड़ने पर वह अपनी अलग पार्टी बना सकते हैं। उन्होंने जदयू के राजनीतिक भविष्य पर भी सवाल उठाए। हालांकि, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बारे में उन्होंने कहा कि उनके प्रति व्यक्तिगत दूरी नहीं है और वह उनके खिलाफ कुछ नहीं कहना चाहते।
अब इस मामले में दो सवाल अहम बने हुए हैं। पहला, जदयू के संविधान के तहत प्रदेश अध्यक्ष की ओर से की गई कार्रवाई की वैधता को लेकर उठे सवालों का समाधान कैसे होगा। दूसरा, विधानसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए भेजे गए पत्र पर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी। पार्टी से निष्कासन और विधानसभा की सदस्यता समाप्त होना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए केवल पार्टी के आदेश से विधायक की सदस्यता अपने आप समाप्त नहीं होती।
फिलहाल, अनंत सिंह के निष्कासन ने बिहार की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। आने वाले दिनों में जदयू की ओर से इस कार्रवाई पर विस्तृत स्पष्टीकरण, संवैधानिक प्रक्रिया और विधानसभा स्तर पर होने वाली कार्रवाई से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।