दिल्ली दंगा मामले में आरोपी और ‘पिंजरा तोड़’ से जुड़ी कार्यकर्ता देवांगना कलिता को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी, जिसमें आरोप तय होने से पहले अभियोजन पक्ष को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
मामला उन इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से जुड़ा है, जिन्हें जांच एजेंसी ने अपनी जांच के दौरान एकत्र किया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पहले दिए गए अपने आदेश में कहा था कि आरोप तय होने से पहले अभियोजन पक्ष इन डिजिटल साक्ष्यों को उपलब्ध कराए। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश के क्रियान्वयन पर फिलहाल रोक लगा दी है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद फिलहाल अभियोजन पक्ष को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सौंपने की बाध्यता नहीं रहेगी, जब तक इस मामले पर आगे सुनवाई कर अंतिम निर्णय नहीं लिया जाता। अदालत अब इस कानूनी प्रश्न पर विस्तार से विचार करेगी कि आरोप तय होने से पहले अभियुक्त को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य उपलब्ध कराने का अधिकार किस सीमा तक लागू होता है।
यह मामला केवल एक आरोपी तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि आपराधिक मामलों में डिजिटल साक्ष्यों की उपलब्धता और अभियुक्त के अधिकारों से जुड़े व्यापक कानूनी पहलुओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए इस पर न्यायपालिका और कानूनी विशेषज्ञों की नजर बनी हुई है।
दिल्ली दंगा मामलों की सुनवाई पहले से ही विभिन्न अदालतों में जारी है और सुप्रीम कोर्ट का यह अंतरिम आदेश आगे की न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।