नई दिल्ली। दिल्ली का मयूर विहार आज राजधानी के प्रमुख रिहायशी इलाकों में गिना जाता है। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, बाजार, स्कूल, पार्क और मेट्रो कनेक्टिविटी इस इलाके की पहचान बन चुके हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस इलाके का नाम ‘मयूर विहार’ ही क्यों रखा गया? क्या सचमुच यहां कभी बड़ी संख्या में मोर रहा करते थे? इस नाम के पीछे जुड़ी कहानी आज भी लोगों की दिलचस्पी का विषय बनी हुई है।
मयूर विहार पूर्वी दिल्ली का एक जाना-पहचाना इलाका है। यमुना के आसपास विकसित हुए दिल्ली के इस हिस्से ने पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरी रूप लिया। आज जहां बहुमंजिला इमारतें और व्यस्त सड़कें नजर आती हैं, वहीं पुराने समय की तस्वीर इससे काफी अलग बताई जाती है। स्थानीय चर्चाओं और प्रचलित मान्यता के मुताबिक, इस क्षेत्र का प्राकृतिक वातावरण कभी काफी खुला हुआ था और यहां हरियाली के साथ पक्षियों की मौजूदगी भी देखने को मिलती थी।
क्या मोरों की वजह से पड़ा ‘मयूर विहार’ नाम?
‘मयूर’ का संस्कृत और हिंदी में अर्थ मोर होता है, जबकि ‘विहार’ का अर्थ निवास, विचरण या घूमने-फिरने का स्थान माना जाता है। इसी वजह से आम तौर पर यह धारणा सामने आती है कि मयूर विहार नाम का संबंध इस इलाके में कभी बड़ी संख्या में मौजूद मोरों से रहा होगा।
कहा जाता है कि पुराने समय में यमुना के आसपास और पूर्वी दिल्ली के कुछ हिस्सों में अपेक्षाकृत अधिक खुला क्षेत्र था। हरियाली और प्राकृतिक वातावरण के कारण यहां कई प्रकार के पक्षियों का बसेरा रहा करता था। इसी प्राकृतिक माहौल से जोड़कर मयूर विहार के नाम की कहानी सुनाई जाती है।
हालांकि, इस बात को लेकर सावधानी जरूरी है। केवल नाम के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि मयूर विहार का आधिकारिक नामकरण बड़ी संख्या में मोरों की मौजूदगी के कारण ही हुआ था। उपलब्ध आम जानकारियों में इस दावे को प्रमाणित करने वाला कोई स्पष्ट आधिकारिक दस्तावेज सामने नहीं आता। इसलिए इसे स्थानीय मान्यता और प्रचलित कहानी के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
1970 के दशक में इलाका कैसा दिखता था?
मयूर विहार के मौजूदा स्वरूप की तुलना अगर इसके पुराने दौर से की जाए तो काफी बड़ा अंतर नजर आता है। पूर्वी दिल्ली के इस हिस्से में शहरी विकास धीरे-धीरे बढ़ा। उस समय कई क्षेत्रों में आबादी आज की तुलना में कम थी और खाली जमीन तथा हरियाली के हिस्से अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देते थे।
यमुना के आसपास का भूगोल भी इस क्षेत्र के वातावरण को प्रभावित करता था। ऐसे इलाकों में अलग-अलग प्रजातियों के पक्षियों का दिखाई देना असामान्य नहीं था। स्थानीय लोगों के बीच इसी प्राकृतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी कई कहानियां समय के साथ लोकप्रिय होती गईं।
मयूर विहार के नाम को लेकर भी ऐसी ही एक कहानी लंबे समय से चर्चा में है कि कभी यहां मोर दिखाई देते थे और उनके कारण इस क्षेत्र को ‘मयूर विहार’ कहा जाने लगा।
शहरीकरण ने बदल दिया पूरा प्राकृतिक माहौल
दिल्ली के तेजी से विस्तार के साथ पूर्वी दिल्ली में भी निर्माण कार्य बढ़ा। आवासीय कॉलोनियां विकसित हुईं, सड़कें बनीं और सार्वजनिक परिवहन की सुविधाओं में विस्तार हुआ। धीरे-धीरे खुले इलाकों की जगह इमारतों और व्यवस्थित रिहायशी क्षेत्रों ने ले ली।
मयूर विहार भी इस बदलाव से अछूता नहीं रहा। आज यहां आधुनिक अपार्टमेंट, बाजार, स्कूल, अस्पताल, कार्यालय और परिवहन की सुविधाएं मौजूद हैं। मेट्रो और सड़क संपर्क ने इस इलाके को दिल्ली के दूसरे हिस्सों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
इस विकास के साथ प्राकृतिक क्षेत्र पहले की तुलना में सीमित हुए। यही वजह है कि पुराने समय में पक्षियों और अन्य वन्यजीवों की मौजूदगी से जुड़ी कहानियां आज लोगों को और ज्यादा आकर्षित करती हैं।
क्या आज भी मयूर यहां दिखाई देते हैं?
दिल्ली में मोर कई इलाकों में देखे जाने की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। हालांकि, मयूर विहार के नाम को सीधे यहां बड़ी संख्या में मोरों के स्थायी निवास से जोड़ना प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
शहरी इलाकों में हरियाली वाले पार्क, खुले स्थान और अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध करा सकते हैं। इसलिए किसी समय इस इलाके या इसके आसपास मोरों की मौजूदगी रही हो, यह संभव जरूर माना जा सकता है, लेकिन इसकी संख्या और नामकरण के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए ऐतिहासिक प्रमाण जरूरी होंगे।
‘मयूर विहार’ नाम अपने आप में है खास
मयूर विहार की कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है कि एक आधुनिक शहरी क्षेत्र के नाम में प्रकृति की झलक दिखाई देती है। आज जब यह इलाका दिल्ली की शहरी पहचान का हिस्सा बन चुका है, तब ‘मयूर विहार’ नाम लोगों को इसके कथित पुराने प्राकृतिक स्वरूप की याद दिलाता है।
स्थानीय स्तर पर प्रचलित कहानी सही हो या इसके पीछे कोई अलग प्रशासनिक अथवा ऐतिहासिक कारण रहा हो, नाम ने इस इलाके को एक अलग पहचान जरूर दी है। ‘मयूर’ और ‘विहार’ शब्द मिलकर ऐसा अर्थ पैदा करते हैं, जो सीधे प्रकृति और पक्षियों से जुड़ता है।
नाम के पीछे का सच क्या है?
मयूर विहार के नाम को मोरों से जोड़ने वाली कहानी दिलचस्प और लोकप्रिय जरूर है, लेकिन इसे प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य मानने से पहले आधिकारिक रिकॉर्ड या विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज देखना जरूरी है। यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
इसलिए अगली बार जब आप मयूर विहार से गुजरें और इस नाम पर नजर पड़े, तो एक बार जरूर सोचिएगा—क्या कभी इसी इलाके की हरियाली के बीच मोर खुलेआम विचरण करते होंगे? शायद यही सवाल इस जगह के नाम से जुड़ी कहानी को आज भी इतना रोचक बनाता है।