नई दिल्ली। फिजिक्स वाला के संस्थापक और चर्चित शिक्षक अलख पांडे से जुड़े पर्सनैलिटी राइट्स मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी ने ऑनलाइन अभिव्यक्ति, पैरोडी और किसी सार्वजनिक व्यक्ति के अधिकारों को लेकर एक अहम बहस को सामने ला दिया है। अदालत ने एक ओर अलख पांडे को कथित अश्लील सामग्री, बिना अनुमति उनके व्यक्तित्व के व्यावसायिक इस्तेमाल और उनकी पहचान की नकल यानी इम्पर्सोनेशन से अंतरिम सुरक्षा दी, वहीं दूसरी ओर यह भी स्पष्ट किया कि पर्सनैलिटी राइट्स का दायरा इतना व्यापक नहीं बनाया जा सकता कि वैध व्यंग्य, कार्टून, पैरोडी या आलोचनात्मक अभिव्यक्ति पर रोक लग जाए।
मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी के समक्ष हुई। अदालत के समक्ष अलख पांडे की ओर से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और अन्य माध्यमों पर उनके नाम, तस्वीर और पहचान के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया गया था। याचिका में आरोप लगाया गया कि कुछ इंटरनेट प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं द्वारा उनके नाम और छवि का इस्तेमाल कर सामग्री तैयार की जा रही थी और कुछ मामलों में इससे आर्थिक लाभ भी कमाया जा रहा था।
अश्लील सामग्री और पहचान के गलत इस्तेमाल पर सुरक्षा
अदालत ने मामले में तीन प्रमुख श्रेणियों की सामग्री को लेकर अंतरिम संरक्षण की दिशा में कदम उठाया। इनमें यौन रूप से अश्लील या आपत्तिजनक तरीके से अलख पांडे की छवि का इस्तेमाल, बिना लाइसेंस या अनुमति उनके व्यक्तित्व से आर्थिक लाभ कमाना और उनकी पहचान की नकल कर किसी अन्य व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करना शामिल है। इससे स्पष्ट है कि अदालत ने व्यक्ति की प्रतिष्ठा और पहचान के व्यावसायिक दुरुपयोग को सामान्य ऑनलाइन अभिव्यक्ति से अलग माना है।
इससे पहले 5 अगस्त 2026 को भी दिल्ली हाईकोर्ट ने अलख पांडे की याचिका पर अंतरिम आदेश देते हुए कथित आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश दिए थे। उस कार्यवाही में अदालत ने उनके नाम और तस्वीर के कथित दुरुपयोग, अश्लील सामग्री, अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल और इम्पर्सोनेशन से जुड़े मामलों पर गौर किया था।
सोशल मीडिया पोस्ट और स्टिकर पैक का भी मुद्दा
अलख पांडे की ओर से अदालत में यह भी बताया गया कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और स्टिकर पैक में उनके नाम, चेहरे और अन्य पहचान संबंधी विशेषताओं का इस्तेमाल किया जा रहा है। आरोप यह भी था कि कुछ सामग्री को इस तरह तैयार किया गया जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंच सकता है और कुछ मामलों में उनके व्यक्तित्व का इस्तेमाल व्यावसायिक लाभ के लिए किया जा रहा है।
अदालत के समक्ष इम्पर्सोनेशन यानी किसी व्यक्ति की पहचान की नकल कर उसके नाम या पहचान से गतिविधियां संचालित करने का मुद्दा भी आया। ऐसे मामलों में किसी सार्वजनिक व्यक्ति के नाम और पहचान का गलत इस्तेमाल केवल आलोचना या मजाक का मामला नहीं रह जाता, बल्कि इससे पहचान, प्रतिष्ठा और व्यावसायिक अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
पैरोडी और व्यंग्य पर कोर्ट ने क्यों दी चेतावनी?
मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अदालत की वह टिप्पणी है जिसमें पर्सनैलिटी राइट्स के व्यापक इस्तेमाल को लेकर सावधानी जताई गई। हाईकोर्ट ने कहा कि इन अधिकारों का इस्तेमाल इस हद तक नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति से संबंधित गलत गतिविधियों की जानकारी के प्रसार को रोक दिया जाए या कार्टून, व्यंग्य, लैम्पूनिंग और पैरोडी जैसी अभिव्यक्तियों को ही खत्म कर दिया जाए।
अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी सामग्री में किसी व्यक्ति की पहचान या व्यक्तित्व का व्यावसायिक शोषण नहीं हो रहा है, तो केवल पर्सनैलिटी राइट्स का दावा करके हर प्रकार की आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक सामग्री पर रोक लगाने की मांग उचित नहीं हो सकती।
यही वजह है कि इस मामले को केवल अलख पांडे की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से जुड़े विवाद के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि डिजिटल दौर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पर्सनैलिटी राइट्स के बीच संतुलन के उदाहरण के तौर पर भी देखा जा रहा है।
कोर्ट ने blanket ban से क्यों बनाई दूरी?
अदालत के सामने एक बड़ी चुनौती यह थी कि ऑनलाइन दुनिया में किसी व्यक्ति की पहचान का दुरुपयोग रोकते हुए वैध अभिव्यक्ति को कैसे सुरक्षित रखा जाए। अगर किसी सार्वजनिक व्यक्ति के नाम, चेहरे या व्यक्तित्व से जुड़ी हर सामग्री को पर्सनैलिटी राइट्स के नाम पर हटाने का रास्ता खुल जाए, तो व्यंग्य, आलोचना और सार्वजनिक विमर्श भी प्रभावित हो सकते हैं।
इसी संदर्भ में अदालत ने व्यापक या blanket राहत देने के बजाय कथित उल्लंघनों की अलग-अलग श्रेणियों पर ध्यान दिया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवा प्रदाता या डोमेन नेम रजिस्ट्रार को स्वयं यह तय करने की जिम्मेदारी नहीं दी गई है कि कौन-सी वेबसाइट अवैध है। उनकी भूमिका तकनीकी तौर पर यह जांचने तक सीमित रखी गई है कि संबंधित वेबसाइट किसी ऐसे पक्ष की mirror, alphanumeric या redirect वेबसाइट है या नहीं, जिसके खिलाफ अदालत ने अंतरिम रोक लगाई है।
सार्वजनिक हस्तियों के लिए क्या मायने रखता है फैसला?
डिजिटल प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ सार्वजनिक हस्तियों के नाम, तस्वीर, आवाज, वीडियो और अन्य पहचान संबंधी विशेषताओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। ऐसे में पर्सनैलिटी राइट्स का सवाल अब केवल फिल्मों या विज्ञापनों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया पोस्ट, मीम, स्टिकर, वीडियो, वेबसाइट और अन्य डिजिटल माध्यम भी इस बहस का हिस्सा बन चुके हैं।
अलख पांडे मामले में अदालत की टिप्पणी यह संकेत देती है कि किसी व्यक्ति की पहचान का व्यावसायिक या भ्रामक इस्तेमाल और वैध व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति—दोनों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता। अदालत ने जहां कथित अश्लील सामग्री और अनधिकृत व्यावसायिक इस्तेमाल के खिलाफ सुरक्षा की दिशा में कदम उठाया, वहीं पैरोडी और व्यंग्य जैसे वैध अभिव्यक्ति के रूपों को लेकर सावधानी भी बरती।
सोशल मीडिया यूजर्स के लिए भी अहम संदेश
इस मामले से सोशल मीडिया यूजर्स के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश निकलता है। किसी सार्वजनिक व्यक्ति पर टिप्पणी, व्यंग्य या पैरोडी करना अपने आप में हर स्थिति में गैरकानूनी नहीं माना जा सकता, लेकिन किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ कमाना, फर्जी पहचान बनाना या अश्लील एवं आपत्तिजनक सामग्री तैयार करना अलग कानूनी सवाल खड़े कर सकता है।
इसलिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किसी सार्वजनिक व्यक्ति से संबंधित सामग्री साझा करते समय अभिव्यक्ति और अधिकारों के बीच अंतर समझना जरूरी है। अदालत की हालिया टिप्पणी इसी संतुलन की ओर संकेत करती है।
निष्कर्ष: अलख पांडे की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाही ने एक तरफ ऑनलाइन पहचान के दुरुपयोग और कथित अश्लील सामग्री के खिलाफ सुरक्षा का रास्ता दिखाया है, तो दूसरी तरफ यह भी रेखांकित किया है कि पर्सनैलिटी राइट्स को अभिव्यक्ति की हर आलोचनात्मक या व्यंग्यात्मक शैली पर रोक लगाने का साधन नहीं बनाया जा सकता। यही संतुलन इस मामले को डिजिटल अधिकारों और ऑनलाइन अभिव्यक्ति की बहस में महत्वपूर्ण बनाता है।