शिलांग: मेघालय के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता हैली वार को इस वर्ष देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया जाएगा। उन्हें यह सम्मान खासी समुदाय की सदियों पुरानी “लिविंग रूट ब्रिज” जैव-तकनीक को संरक्षित करने और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जा रहा है। इस घोषणा के बाद मेघालय सहित पूरे पूर्वोत्तर भारत में खुशी और गर्व का माहौल है।
मेघालय के घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों में पाए जाने वाले “लिविंग रूट ब्रिज” दुनिया भर में अपनी अनोखी संरचना और प्राकृतिक इंजीनियरिंग के लिए प्रसिद्ध हैं। ये पुल रबर फिग पेड़ों की जड़ों को वर्षों तक दिशा देकर तैयार किए जाते हैं। खासी और जयंतिया समुदाय के लोग पीढ़ियों से इस तकनीक का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। इन पुलों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं और समय के साथ और अधिक मजबूत बनते जाते हैं।
हैली वार ने पिछले कई वर्षों से इन प्राकृतिक पुलों के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए लगातार काम किया है। उन्होंने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर युवाओं को पारंपरिक पर्यावरणीय ज्ञान से जोड़ने की पहल भी की। उनके प्रयासों से कई ऐसे रूट ब्रिज, जो धीरे-धीरे उपेक्षा का शिकार हो रहे थे, अब फिर से संरक्षित और विकसित किए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि “लिविंग रूट 브िज” केवल पर्यटन का आकर्षण नहीं, बल्कि सतत विकास और जलवायु परिवर्तन से निपटने का एक बेहतरीन उदाहरण हैं। आधुनिक कंक्रीट के पुलों के मुकाबले ये प्राकृतिक पुल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते और स्थानीय जैव विविधता को भी सुरक्षित रखते हैं।
पद्म श्री सम्मान की घोषणा के बाद हैली वार ने कहा कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि पूरे खासी समुदाय और उनकी पारंपरिक ज्ञान प्रणाली का सम्मान है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस उपलब्धि से नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत को बचाने के लिए प्रेरित होगी।
मेघालय सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने भी हैली वार को बधाई देते हुए इसे राज्य के लिए गौरव का क्षण बताया है। विशेषज्ञों का कहना है कि उनके कार्यों से दुनिया को यह सीख मिलती है कि पारंपरिक ज्ञान और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर भी विकास संभव है।