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FCRA बिल को लेकर लोकसभा बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की मीटिंग पर टिकी नजरें

नई दिल्लीःसंसद के मानसून सत्र के अंतिम चरण में विदेशी अंशदान विनियमन यानी FCRA संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की आज होने वाली बैठक को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि सदन के बचे हुए कामकाजी दिनों में किन विधेयकों पर चर्चा […]

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  • August 10, 2026 11:05 am IST, Published 1 hour ago

नई दिल्लीःसंसद के मानसून सत्र के अंतिम चरण में विदेशी अंशदान विनियमन यानी FCRA संशोधन विधेयक को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। लोकसभा की बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की आज होने वाली बैठक को इस लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि सदन के बचे हुए कामकाजी दिनों में किन विधेयकों पर चर्चा और मतदान कराया जाएगा। FCRA बिल को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेदों के बीच अब इस बैठक के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हैं।
FCRA यानी फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन एक्ट से जुड़े संशोधन विधेयक का उद्देश्य विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन के इस्तेमाल और उससे जुड़ी संपत्तियों के नियमन की व्यवस्था को और स्पष्ट करना है।

सरकार की ओर से इसे विदेशी अंशदान के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष और कुछ संगठनों की ओर से प्रस्तावित प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

FCRA संशोधन विधेयक 2026 को लोकसभा में 25 मार्च 2026 को पेश किया गया था। प्रस्तावित बदलावों में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों के पंजीकरण, विदेशी धन से जुड़ी संपत्तियों और पंजीकरण समाप्त होने की स्थिति में ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर नए प्रावधान शामिल हैं। विधेयक में एक नामित प्राधिकरण बनाए जाने का प्रस्ताव है, जिसके तहत किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द होने, समाप्त होने या संस्था की ओर से प्रमाणपत्र सरेंडर किए जाने की स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे जुड़ी संपत्तियों को लेकर कार्रवाई की जा सकेगी।

विधेयक के इन्हीं प्रावधानों को लेकर सबसे ज्यादा बहस होने की संभावना है। विपक्ष की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि सरकार को गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संस्थाओं की संपत्तियों पर इतनी व्यापक शक्तियां मिलनी चाहिए या नहीं। खासतौर पर उन संपत्तियों को लेकर चर्चा है, जिनका निर्माण विदेशी अंशदान से हुआ है। सरकार का पक्ष है कि विदेशी फंड से जुड़ी गतिविधियों में नियमों का पालन और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना जरूरी है।

प्रस्तावित विधेयक में कुछ अपराधों के लिए सजा के प्रावधानों में भी बदलाव का प्रस्ताव है। रिपोर्टों के मुताबिक, अधिकतम जेल की सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष किए जाने का प्रावधान है। इसके अलावा जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की अनुमति से संबंधित व्यवस्था भी प्रस्तावित है। इन बदलावों को लेकर भी संसद में चर्चा के दौरान सरकार और विपक्ष के बीच बहस देखने को मिल सकती है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार FCRA बिल को मौजूदा सत्र में चर्चा और पारित कराने के लिए कितना समय देती है। संसद के मानसून सत्र के सीमित बचे दिनों के बीच बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक में सदन के कामकाज का कार्यक्रम तय किया जाएगा। ऐसे में बैठक में FCRA बिल की स्थिति और उसके लिए संभावित समय पर चर्चा अहम मानी जा रही है।

राजनीतिक रूप से भी FCRA बिल की टाइमिंग महत्वपूर्ण है। संसद में किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को सदन में पर्याप्त समर्थन और चर्चा के लिए समय की जरूरत होती है। ऐसे में सरकार और विपक्ष के बीच चल रही राजनीतिक बातचीत का असर विधेयक की आगे की प्रक्रिया पर पड़ सकता है।

बिजनेस एडवाइजरी कमेटी की बैठक के बाद यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि FCRA बिल को मौजूदा सत्र में चर्चा के लिए कब लाया जाएगा और सरकार इसे आगे बढ़ाने को लेकर क्या रणनीति अपनाती है। फिलहाल विधेयक को लेकर संसद के भीतर और बाहर राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं और आने वाले दिनों में इस पर बहस और तेज होने की संभावना है।

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