नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट परिसर में कथित अभद्र व्यवहार और सुरक्षाकर्मी के साथ धक्का-मुक्की के आरोप में गिरफ्तार लखनऊ विश्वविद्यालय के दो विधि (लॉ) छात्रों को पटियाला हाउस कोर्ट से जमानत मिल गई है। अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि जमानत सामान्य नियम है, जबकि जेल अपवाद है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के असंयमित या अनुचित व्यवहार से देश की सर्वोच्च अदालत की गरिमा प्रभावित नहीं होती।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों आरोपियों को राहत देते हुए कहा कि जांच प्रक्रिया जारी रह सकती है और आरोपी जमानत पर रहते हुए भी उसमें सहयोग कर सकते हैं। अदालत का मानना था कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से हिरासत में रखना उचित नहीं है, खासकर तब जब जांच के लिए उसकी निरंतर जेल में मौजूदगी आवश्यक न हो।
यह मामला उस समय सामने आया था जब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दो छात्रों पर कथित रूप से अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने और सुरक्षा में तैनात कर्मी के साथ धक्का-मुक्की करने का आरोप लगा। घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों की शिकायत पर पुलिस ने दोनों छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज किया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष दलील दी कि आरोपी छात्र हैं, उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है और वे जांच में पूरा सहयोग देने को तैयार हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि उन्हें लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं बनता। वहीं, अभियोजन पक्ष ने आरोपों की गंभीरता का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया। हालांकि अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद जमानत मंजूर कर ली।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि न्यायपालिका जैसी मजबूत संस्था की प्रतिष्ठा किसी एक व्यक्ति के कथित अनुचित व्यवहार से कम नहीं हो सकती। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कानून सभी के लिए समान है और प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई तथा कानूनी अधिकार प्राप्त हैं।
जमानत देते समय अदालत ने आरोपियों को कुछ शर्तों का पालन करने का निर्देश भी दिया। उन्हें जांच एजेंसी के साथ सहयोग करना होगा, आवश्यकता पड़ने पर पूछताछ में शामिल होना होगा और किसी भी गवाह या साक्ष्य को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करना होगा। साथ ही अदालत की अनुमति के बिना मामले से संबंधित किसी भी गतिविधि में बाधा उत्पन्न नहीं करने की हिदायत भी दी गई।
अदालत का यह आदेश भारतीय न्याय व्यवस्था के उस स्थापित सिद्धांत को दोहराता है, जिसके अनुसार दोष सिद्ध होने तक प्रत्येक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है। ऐसे मामलों में अदालत आरोपी के फरार होने की आशंका, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की संभावना और जांच पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर जमानत पर फैसला करती है। फिलहाल दोनों छात्र जमानत पर रिहा होंगे, जबकि मामले की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मामले की अगली सुनवाई में जांच की प्रगति और अन्य पहलुओं पर विचार किया जाएगा।