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डीपफेक पर सरकार सख्त, तीन घंटे में हटाना होगा एआई कंटेंट

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग के साथ फर्जी वीडियो, तस्वीरों और डीपफेक सामग्री के तेजी से प्रसार को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। संशोधित नियमों के तहत अब सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को सरकारी अथवा न्यायालय के आदेश मिलने […]

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  • August 7, 2026 12:40 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग के साथ फर्जी वीडियो, तस्वीरों और डीपफेक सामग्री के तेजी से प्रसार को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) नियमों में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। संशोधित नियमों के तहत अब सोशल मीडिया कंपनियों और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को सरकारी अथवा न्यायालय के आदेश मिलने के बाद अवैध डीपफेक सामग्री को अधिकतम तीन घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा। इससे पहले इस कार्रवाई के लिए 36 घंटे का समय निर्धारित था।

सरकार का मानना है कि AI तकनीक का दुरुपयोग कर तैयार किए जा रहे फर्जी वीडियो और तस्वीरें न केवल लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि समाज में भ्रम फैलाने, साइबर अपराध बढ़ाने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का भी कारण बन सकती हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए नियमों को और सख्त बनाया गया है।

संशोधित प्रावधानों के अनुसार, AI की मदद से तैयार की गई हर फोटो, वीडियो या अन्य डिजिटल सामग्री पर स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाई गई है। इसके लिए संबंधित प्लेटफॉर्म को कंटेंट पर उचित लेबल और मेटाडेटा जोड़ना होगा, ताकि उपयोगकर्ताओं को यह जानकारी मिल सके कि सामग्री वास्तविक नहीं बल्कि एआई आधारित है। इससे लोगों के भ्रमित होने की संभावना कम होगी और गलत सूचना पर नियंत्रण लगाने में मदद मिलेगी।

नए नियमों में आपत्तिजनक और संवेदनशील सामग्री के मामलों में भी समयसीमा घटा दी गई है। यदि किसी शिकायत में नग्नता, किसी की पहचान बदलकर धोखाधड़ी करने या अन्य गंभीर डिजिटल अपराधों का मामला सामने आता है, तो संबंधित प्लेटफॉर्म को दो घंटे के भीतर कार्रवाई करनी होगी। अन्य श्रेणी के मामलों में भी पहले की तुलना में कम समय में शिकायतों का निस्तारण करना होगा।

सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों के लिए तकनीकी स्तर पर भी नई जिम्मेदारियां तय की हैं। अब उन्हें ऐसे उन्नत डिजिटल टूल और मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने होंगे, जो डीपफेक, बाल यौन शोषण से जुड़ी सामग्री और अन्य गंभीर अवैध कंटेंट को अपलोड होने से पहले या तुरंत बाद पहचानकर रोक सकें। उद्देश्य यह है कि हानिकारक सामग्री वायरल होने से पहले ही उसे नियंत्रित किया जा सके।

आईटी नियमों के पालन को लेकर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि कोई प्लेटफॉर्म निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करता है, तो उसे सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत मिलने वाली “सेफ हार्बर” सुरक्षा का लाभ नहीं मिलेगा। इसका अर्थ यह है कि संबंधित कंपनी अपने प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध अवैध सामग्री के लिए सीधे कानूनी जिम्मेदारी का सामना कर सकती है और उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी संभव होगी।

डिजिटल विशेषज्ञों का मानना है कि डीपफेक तकनीक के तेजी से फैलने के कारण साइबर सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता दोनों के सामने नई चुनौतियां पैदा हुई हैं। कई मामलों में एआई की सहायता से बनाए गए फर्जी वीडियो और तस्वीरों का उपयोग लोगों की छवि खराब करने, वित्तीय धोखाधड़ी करने और गलत सूचनाएं फैलाने के लिए किया गया है। ऐसे में कड़े नियम डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम माने जा रहे हैं।

हालांकि, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मजबूत तकनीकी ढांचा, पारदर्शी प्रक्रिया और शिकायतों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था जरूरी होगी। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऑनलाइन सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना भी महत्वपूर्ण रहेगा।

सरकार का कहना है कि इन संशोधित नियमों का उद्देश्य AI तकनीक के नवाचार को रोकना नहीं, बल्कि उसके जिम्मेदार और सुरक्षित उपयोग को बढ़ावा देना है। आने वाले समय में इन नियमों के लागू होने से डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही बढ़ने और फर्जी एआई कंटेंट पर प्रभावी नियंत्रण की उम्मीद की जा रही है।

 

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