नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के कामकाज और उसके पुनर्गठन से जुड़े मामले में बुधवार को महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि जब तक नए सिरे से निर्वाचित BCI का गठन नहीं हो जाता, तब तक काउंसिल के महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के समक्ष रखा जाएगा। दोनों कानून अधिकारियों को संबंधित बैठकों में भी आमंत्रित किया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने यह निर्देश दिया। अदालत ने फिलहाल BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा को हटाने की मांग पर कोई प्रतिकूल आदेश जारी नहीं किया है। कोर्ट ने अपना ध्यान पहले राज्य बार काउंसिलों की लंबित चुनावी प्रक्रिया पूरी कराने और उसके बाद BCI के पुनर्गठन पर केंद्रित रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन राज्य बार काउंसिलों का नए सिरे से गठन हो चुका है, उन्हें अपनी संरचना अधिसूचित होने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर वैधानिक पदाधिकारियों का चुनाव करना होगा। इसके साथ ही प्रत्येक राज्य बार काउंसिल को BCI के लिए अपने प्रतिनिधि का भी चुनाव करना होगा।
अदालत ने सभी संबंधित राज्य बार काउंसिलों को इस प्रक्रिया के अनुपालन की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करने का निर्देश दिया है। इन रिपोर्टों के आधार पर कोर्ट आगे BCI के पुनर्गठन के मुद्दे पर विचार करेगा।
सुनवाई के दौरान BCI चेयरमैन और वाइस चेयरमैन के कार्यकाल का मुद्दा भी सामने आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि BCI के नियमों में दोनों पदों का कार्यकाल दो वर्ष निर्धारित है, लेकिन 21 अप्रैल 2025 की अधिसूचना के जरिए इसे पांच वर्ष तक बढ़ाने का प्रावधान किया गया। इसके चलते कार्यकाल 2030 तक रहने की बात सामने आई।
वरिष्ठ वकील माधवी दीवान ने अदालत के सामने BCI Rule 12(2) का हवाला देते हुए कहा कि नियम के तहत चेयरमैन और वाइस चेयरमैन का कार्यकाल दो साल है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि यदि नियम में कार्यकाल दो वर्ष तय है, तो उसे पांच साल तक बढ़ाने वाली अधिसूचना किस कानूनी प्रावधान के तहत जारी की गई। CJI सूर्यकांत ने भी नियम में निर्धारित अवधि और अधिसूचना में किए गए बदलाव के बीच अंतर पर सवाल उठाया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस अधिसूचना की वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।
सुनवाई के दौरान BCI से जुड़े PEARL Trust का मुद्दा भी अदालत के सामने आया। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट में कुछ लोगों को स्थायी प्रबंध न्यासी बनाया गया है। उनका तर्क था कि BCI के निर्वाचित सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी यदि वे व्यक्तिगत रूप से ट्रस्टी बने रहते हैं, तो इस व्यवस्था पर सवाल उठता है। अदालत ने पूछा कि यदि BCI एक निर्वाचित और बदलती हुई संस्था है, तो उसके मौजूदा सदस्य संस्था की संपत्तियों से ऐसा ट्रस्ट कैसे बना सकते हैं, जिसमें वे स्थायी ट्रस्टी बने रहें।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी पद से जुड़ी ex-officio ट्रस्टी की भूमिका पद छोड़ने के साथ समाप्त हो सकती है, लेकिन किसी व्यक्ति को व्यक्तिगत तौर पर स्थायी ट्रस्टी बनाया जाना अलग विषय है। याचिकाकर्ताओं ने PEARL Trust और अन्य ट्रस्टों के कामकाज की जांच की मांग भी की है, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल जांच समिति गठित करने का आदेश नहीं दिया।
CJI सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि अदालत का उद्देश्य किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं है। कोर्ट का ध्यान BCI की संस्थागत व्यवस्था और उसके वैधानिक ढांचे पर है। अदालत के निर्देशों के बाद अब राज्य बार काउंसिलों की चुनावी प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो गई है।
इसमें आवश्यक Co-Option प्रक्रिया पूरी करना, नए पदाधिकारियों का चुनाव करना और प्रत्येक राज्य बार काउंसिल से BCI के प्रतिनिधि का चयन शामिल है। इन प्रक्रियाओं की अनुपालन रिपोर्ट मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट BCI के पुनर्गठन को लेकर आगे की दिशा तय करेगा।