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बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली: बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम याचिका दाखिल की गई है। याचिका में मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस मामले में […]

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  • September 10, 2026 12:55 pm IST, Published 1 hour ago
नई दिल्ली: बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम याचिका दाखिल की गई है। याचिका में मांग की गई है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में नाबालिगों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति को अनिवार्य करने की मांग भी की गई है।

यह याचिका NGO ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस’ की ओर से दायर की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा डिजिटल व्यवस्था में बच्चों की उम्र को लेकर अलग-अलग मानक लागू हैं। कई बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 13 वर्ष की उम्र से अकाउंट बनाने की अनुमति देते हैं। याचिका में फेसबुक और स्नैपचैट इंडिया जैसे प्लेटफॉर्म का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि उनकी न्यूनतम आयु सीमा अमेरिकी कानून और वहां की व्यवस्था से प्रभावित है, जबकि भारत में 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को नाबालिग माना जाता है।

याचिका में केंद्र सरकार से सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में आवश्यक बदलाव करने या बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए अलग दिशा-निर्देश तैयार करने की मांग की गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 18 साल से कम उम्र के किसी बच्चे को सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल सेवा उपलब्ध कराने से पहले उसके माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सहमति जरूरी होनी चाहिए।

याचिकाकर्ता ने यह भी सुझाव दिया है कि केवल सहमति लेना पर्याप्त नहीं होना चाहिए, बल्कि जरूरत के अनुसार माता-पिता या अभिभावक की पहचान का सत्यापन भी किया जाना चाहिए। इसके लिए वेरिफिकेशन या e-KYC जैसी व्यवस्था अपनाने की मांग की गई है। याचिका के मुताबिक सत्यापन की प्रक्रिया संबंधित डिजिटल सेवा के स्वरूप और उससे जुड़े जोखिम के आधार पर तय की जा सकती है।

याचिका में बच्चों के ऑनलाइन रहने से जुड़े कई संभावित खतरों का उल्लेख किया गया है। इसमें ऑनलाइन ग्रूमिंग, यौन शोषण, मानव तस्करी, साइबरबुलिंग, निजी जानकारी के दुरुपयोग और बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर उनकी प्रोफाइल तैयार किए जाने जैसे जोखिम शामिल हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि कम उम्र में बिना पर्याप्त निगरानी के डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच बच्चों को ऐसे कंटेंट और लोगों के संपर्क में ला सकती है, जिनसे उनकी सुरक्षा और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।

याचिका में उम्र के अनुरूप कंटेंट उपलब्ध कराने का मुद्दा भी उठाया गया है। इसके अनुसार डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों की पहुंच केवल ऐसी व्यवस्था के तहत होनी चाहिए, जिसमें यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें उनकी उम्र के लिए अनुपयुक्त सामग्री या सेवाओं से बचाया जा रहा है। याचिकाकर्ता ने अदालत से ऐसी व्यापक नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की है, जिसके तहत नाबालिगों के डिजिटल प्लेटफॉर्म इस्तेमाल करने की स्थिति में माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित हो। इसमें उनकी सहमति, पहचान सत्यापन और सेवा के जोखिम के अनुरूप सुरक्षा उपाय शामिल किए जाने की मांग की गई है।

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में बच्चों और इंटरनेट के बीच बढ़ता संपर्क सुरक्षा से जुड़े नए सवाल पैदा कर रहा है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल के कारण कम उम्र के बच्चे भी बड़ी संख्या में डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच बना रहे हैं। ऐसे में सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों के सामने यह चुनौती है कि बच्चों को ऑनलाइन दुनिया से पूरी तरह अलग किए बिना उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए। याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगे जाने के बाद अब इस मुद्दे पर सरकार का रुख महत्वपूर्ण होगा।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है और नोटिस जारी होना अंतिम फैसला नहीं है। अदालत आगे केंद्र सरकार तथा संबंधित पक्षों के जवाब पर विचार करेगी। हालांकि, इस याचिका ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी से जुड़े एक महत्वपूर्ण सवाल को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि भारत नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर किस तरह का कानूनी और तकनीकी सुरक्षा ढांचा तैयार करता है।

 

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