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बुराई पर अच्छाई की जीत: दशहरे का पर्व और जीवन की सच्ची सीख

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है। यह पर्व हमें बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अहंकार पर विनम्रता की जीत का संदेश देता है। हर साल दशहरे के दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण के वध और उसके पुतले के दहन के साथ यह पर्व मनाया जाता […]

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  • October 20, 2026 7:02 am IST, Published 1 hour ago

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है। यह पर्व हमें बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अहंकार पर विनम्रता की जीत का संदेश देता है। हर साल दशहरे के दिन भगवान श्रीराम द्वारा रावण के वध और उसके पुतले के दहन के साथ यह पर्व मनाया जाता है। लेकिन दशहरे का महत्व केवल रावण दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें अपने जीवन में अच्छाई अपनाने और बुराइयों को त्यागने की प्रेरणा भी देता है।

रावण एक विद्वान, शक्तिशाली और पराक्रमी राजा था। उसके पास ज्ञान, धन और सामर्थ्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उसका अहंकार और गलत निर्णय उसके विनाश का कारण बने। भगवान श्रीराम ने सत्य, मर्यादा, धैर्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए रावण का अंत किया। रामायण की यह कथा आज भी हमें सिखाती है कि शक्ति और ज्ञान तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग सही कार्यों के लिए किया जाए।

आज के समय में भी दशहरे का संदेश उतना ही प्रासंगिक है। समाज में भ्रष्टाचार, झूठ, लालच, नफरत, भेदभाव और अन्याय जैसी बुराइयां अनेक रूपों में मौजूद हैं। हम हर साल रावण का पुतला जलाते हैं, लेकिन कई बार अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध और स्वार्थ को पहचानने की कोशिश नहीं करते। दूसरों की गलतियां गिनाना आसान है, मगर अपनी कमियों को स्वीकार करना कठिन।

सच्चे अर्थों में दशहरा तभी सार्थक होगा, जब हम अपने मन के रावण को भी समाप्त करने का संकल्प लेंगे।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि अच्छाई का रास्ता कभी-कभी कठिन जरूर होता है, लेकिन अंततः सत्य और न्याय का महत्व बना रहता है। यदि हम अपने व्यवहार में ईमानदारी अपनाएं, जरूरतमंदों की सहायता करें, महिलाओं का सम्मान करें और किसी के साथ अन्याय न होने दें, तो यही दशहरे की वास्तविक भावना होगी।

बच्चों को भी इस पर्व के माध्यम से सत्य, साहस और अच्छे संस्कारों की सीख दी जानी चाहिए। उन्हें केवल राम और रावण की कहानी सुनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह समझाना भी जरूरी है कि जीवन में सही और गलत के बीच चुनाव कैसे किया जाता है।

दशहरा हमें यह भी सिखाता है कि किसी व्यक्ति की बुराई करने से पहले हमें अपने आचरण पर विचार करना चाहिए। समाज में बदलाव की शुरुआत दूसरों से नहीं, बल्कि स्वयं से होती है। यदि हर व्यक्ति अपने भीतर की एक बुराई को दूर करने का प्रयास करे, तो परिवार, समाज और देश में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।

अंततः, दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन और नए संकल्प का अवसर है। आइए, इस विजयादशमी पर हम सत्य का साथ देने, अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और मानवता के मूल्यों को अपनाने का संकल्प लें।

क्योंकि असली विजय उस दिन होगी, जब रावण का पुतला ही नहीं, हमारे भीतर का अहंकार, लालच और नफरत भी समाप्त होगा। यही बुराई पर अच्छाई की सच्ची जीत है और दशहरे का सबसे बड़ा संदेश भी।

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