नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन, उनकी बेटी वीणा थैकंडीइल, दामाद मोहम्मद रियास और अन्य संबंधित लोगों से जुड़े मामले में जांच पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी है। यह अंतरिम आदेश केरल हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ अपील करने का अवसर देने के लिए दिया गया है, जिसमें मामले में एफआईआर दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एफआईआर पर रोक नहीं लगाई गई है, बल्कि उससे संबंधित जांच फिलहाल सात दिनों तक आगे नहीं बढ़ेगी।
यह मामला केरल की सरकारी कंपनी कोचीन मिनरल्स एंड रूटाइल लिमिटेड (सीएमआरएल) की ओर से आईटी कंपनी एक्सलॉजिक सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को कथित तौर पर किए गए भुगतान से जुड़ा है। आरोप है कि वर्ष 2017 से 2020 के बीच कंपनी को 2.78 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया, जबकि इसके बदले सेवाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं। एक्सलॉजिक कंपनी का संबंध पिनाराई विजयन की बेटी वीणा टी. से बताया गया है। हालांकि, ये आरोप हैं और मामले में अंतिम न्यायिक निर्णय आना बाकी है।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने विजयन, उनकी बेटी और दामाद की याचिकाओं पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने केरल हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश के नौ अक्टूबर के आदेश को चुनौती दी थी। इसके बाद हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर को उनकी अपील खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगाते हुए संबंधित पक्षों को अपनी दलीलें रखने का अवसर देने का फैसला किया। सुनवाई के दौरान पीठ ने साफ किया कि किसी व्यक्ति का पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसे कानून के दायरे में ही रहना होगा। साथ ही अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि क्या मामले में एफआईआर और जांच के निर्देश देने से पहले सभी संबंधित पक्षों को सुनने का पर्याप्त अवसर दिया गया था। न्यायमूर्ति मोहना ने इस बात पर सवाल किया कि ऐसी कौन-सी आपात स्थिति थी, जिसके कारण आरोपित पक्षों को सुने बिना आदेश जारी करना आवश्यक समझा गया।
पीठ ने कहा कि फिलहाल एफआईआर बनी रहेगी, लेकिन अपीलीय स्तर पर संबंधित कानूनी सवालों पर निर्णय होने तक जांच आगे नहीं बढ़ेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एक सप्ताह की रोक को मामले में अंतिम राहत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। आगे का फैसला तथ्यों और कानून के आधार पर संबंधित पीठ करेगी। सुनवाई के दौरान प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की भूमिका पर भी चर्चा हुई। अदालत ने एजेंसी को उसके कानूनी अधिकारों की सीमाओं का ध्यान रखने की हिदायत दी। पीठ ने कहा कि जांच एजेंसी को अपने अधिकारों का उपयोग करते समय दूसरी संस्थाओं के वैधानिक अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अदालत के अनुसार, ईडी अपनी ओर से कानूनी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन राज्य की जांच प्रक्रिया को कानून के मुताबिक आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
इस मामले की पृष्ठभूमि में ईडी की ओर से 22 सितंबर को केरल पुलिस को भेजा गया एक पत्र भी है। इसमें कथित भुगतान के संबंध में संज्ञेय अपराध की आशंका जताई गई थी। इसके बाद राज्य में एफआईआर दर्ज हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि राज्य सरकार पहले ही मामले की प्रारंभिक जांच के लिए नौ सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर चुकी है। ऐसे में एफआईआर दर्ज करने और जांच के निर्देशों की वैधानिक प्रक्रिया पर विचार किया जाना चाहिए। सुनवाई में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(4) से जुड़े प्रावधानों पर भी चर्चा हुई।
इन प्रावधानों के तहत कुछ परिस्थितियों में लोक सेवकों के खिलाफ जांच शुरू करने से पहले निर्धारित अनुमति या प्रक्रिया का पालन करना जरूरी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इन कानूनी पहलुओं पर हाई कोर्ट की खंडपीठ को विस्तार से विचार करना चाहिए। फिलहाल शीर्ष अदालत के आदेश से संबंधित पक्षों को अपनी अपील पर सुनवाई का अवसर मिला है। सात दिनों की अंतरिम रोक के दौरान जांच आगे नहीं बढ़ेगी, लेकिन एफआईआर प्रभावी रहेगी। मामले में आगे की कार्रवाई और जांच की वैधता को लेकर फैसला संबंधित न्यायिक मंच पर होने वाली सुनवाई के बाद स्पष्ट होगा।