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मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देगी विजय सरकार

फिलहाल तमिलनाडु सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानूनी विकल्प तलाशने की है। पुनर्विचार याचिका में सरकार किन आधारों पर राहत मांगती है और शीर्ष अदालत उस पर क्या रुख अपनाती है,

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  • October 30, 2026 8:30 pm IST, Published 50 minutes ago

नई दिल्ली: धर्म परिवर्तन के बाद जातिगत पहचान और आरक्षण के अधिकार को लेकर देश में एक बार फिर बड़ी संवैधानिक बहस छिड़ गई है। तमिलनाडु में इस मुद्दे पर शुरू हुआ विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद राजनीतिक रंग भी लेने लगा है। सुप्रीम कोर्ट से राज्य सरकार को राहत नहीं मिलने के बावजूद मुख्यमंत्री थलपति विजय की सरकार इस मामले को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। सरकार ने शीर्ष अदालत के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का निर्णय लिया है। तमिलनाडु के कानून मंत्री सीटीआर निर्मल कुमार ने 29 अक्टूबर को कैबिनेट बैठक के बाद इसकी जानकारी दी। इस फैसले के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या धर्म परिवर्तन करने के बाद किसी व्यक्ति को उसकी पुरानी जातिगत पहचान के आधार पर दूसरे धर्म के पिछड़े वर्ग में आरक्षण मिल सकता है?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर 2026 को तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस आदेश को निरस्त कर दिया था, जिसके तहत हिंदू धर्म से इस्लाम स्वीकार करने वाले कुछ लोगों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदायों में प्रमाणपत्र हासिल करने का रास्ता दिया गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल धर्म परिवर्तन कर लेने से किसी व्यक्ति को नए धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े वर्ग का सदस्य नहीं माना जा सकता।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की थी। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 16(4) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए कहा कि आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के लिए संबंधित पिछड़े वर्ग की सदस्यता स्थापित करना आवश्यक है। किसी व्यक्ति का पहले किसी पिछड़े जातिगत समूह से संबंधित होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि वह धर्म परिवर्तन के बाद दूसरे धर्म के किसी अधिसूचित पिछड़े समुदाय में शामिल हो गया है। अदालत की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सामाजिक पिछड़ेपन और किसी विशेष अधिसूचित पिछड़े वर्ग की सदस्यता को एक ही आधार पर नहीं देखा जा सकता। आरक्षण की पात्रता निर्धारित करने के लिए संबंधित समुदाय की कानूनी और सामाजिक स्थिति का परीक्षण जरूरी है। केवल पुराने जाति प्रमाणपत्र या पूर्व धार्मिक पहचान के आधार पर आरक्षण का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस पूरे विवाद की शुरुआत समीर अहमद के मामले से हुई थी। बताया जाता है कि उनका पहले नाम परमासिवम था और उन्होंने वर्ष 2015 में इस्लाम धर्म स्वीकार किया था। इसके बाद उन्होंने तमिलनाडु में मुस्लिम लेब्बाई समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया। हालांकि, संबंधित तहसीलदार ने उनका आवेदन स्वीकार नहीं किया। इसके बाद उन्होंने मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की। याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया था कि तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों के आधार पर धर्म परिवर्तन करने वाले हिंदू पिछड़े वर्ग के व्यक्तियों को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम समुदाय का प्रमाणपत्र दिया जा सकता है।

इसी बीच तमिलनाडु सरकार ने 9 मार्च 2024 को एक सरकारी आदेश जारी किया था। इस आदेश में पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, विमुक्त समुदाय और अनुसूचित जाति की पृष्ठभूमि से इस्लाम स्वीकार करने वाले लोगों को सात अधिसूचित पिछड़े मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का प्रमाणपत्र प्राप्त करने की पात्रता देने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, इस सरकारी आदेश को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने 25 जून को इसे असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन 15 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने उसकी अपील खारिज कर दी। अब राज्य सरकार पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रही है।

इस विवाद में संविधान का अनुच्छेद 16(4) भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह प्रावधान राज्य सरकार को उन पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था करने का अधिकार देता है, जिनका सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। हालांकि, आरक्षण का लाभ देने के लिए संबंधित वर्ग की संवैधानिक और कानूनी पात्रता का निर्धारण भी आवश्यक है। इसके अलावा अदालत ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 का भी उल्लेख किया। इसके तहत अनुसूचित जाति का दर्जा सामान्यतः हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म मानने वाले व्यक्तियों तक सीमित रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब तमिलनाडु सरकार की अगली रणनीति पर सबकी निगाहें हैं। सरकार पुनर्विचार याचिका के साथ फरवरी या मार्च 2027 के बाद सामाजिक स्थिति का सर्वे कराने की योजना भी बना रही है।

इस सर्वे के जरिए विभिन्न समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का आकलन किए जाने की संभावना है। हालांकि, सर्वे के निष्कर्ष और उनके आधार पर तैयार होने वाली नीतियों का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम को थलपति विजय की राजनीतिक रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। अभिनेता से राजनेता बने विजय के नेतृत्व में तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) की सरकार के सामने विभिन्न सामाजिक समूहों और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता मजबूत करने की चुनौती है। ऐसे में आरक्षण और सामाजिक न्याय से जुड़े इस मुद्दे पर सरकार का सक्रिय रुख राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

आलोचकों का मानना है कि सरकार का यह कदम आगामी चुनावी समीकरणों और विभिन्न समुदायों के समर्थन को ध्यान में रखकर उठाया जा रहा है। वहीं, सरकार के समर्थक इसे सामाजिक न्याय और समान अवसर सुनिश्चित करने की कोशिश बता सकते हैं। हालांकि, इस मामले को केवल वोट बैंक की राजनीति तक सीमित करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इसके साथ संविधान की व्याख्या और आरक्षण की पात्रता से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी जुड़े हैं। फिलहाल तमिलनाडु सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानूनी विकल्प तलाशने की है। पुनर्विचार याचिका में सरकार किन आधारों पर राहत मांगती है और शीर्ष अदालत उस पर क्या रुख अपनाती है, यह आगे की दिशा तय करेगा। इतना तय है कि धर्म परिवर्तन, जातिगत पहचान और आरक्षण के अधिकार से जुड़ी यह बहस आने वाले समय में देश की राजनीति और संवैधानिक विमर्श का अहम हिस्सा बनी रह सकती है।

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