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केरलम कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ीं, सभी पदाधिकारियों से सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केरलम कांग्रेस के सभी पदाधिकारियों से जवाब मांगा है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि विवादित पोस्ट किस परिस्थिति में प्रकाशित हुई और इसकी जिम्मेदारी किसकी थी। साथ ही पार्टी को अपने हलफनामे के माध्यम से यह बताना होगा कि उसकी ओर से मांगी गई माफी कितनी गंभीर और वास्तविक है।

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • November 6, 2026 5:20 pm IST, Published 10 minutes ago

नई दिल्ली: केरलम प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से सोशल मीडिया पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का मामला अब गंभीर कानूनी मोड़ ले चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए केरलम कांग्रेस के सभी पदाधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। अदालत ने उनसे पूछा है कि संविधान के अनुच्छेद 139 के तहत उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। शुक्रवार को न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि न्यायपालिका की प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता के साथ किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि संविधान सर्वोच्च है और कोई भी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल उससे ऊपर नहीं हो सकता। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है और इसे कमजोर करने की किसी भी कोशिश को गंभीरता से लिया जाएगा।

मामले की सुनवाई के दौरान केरलम कांग्रेस की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि पार्टी इस संबंध में हलफनामा दाखिल करेगी। उन्होंने दलील दी कि विवादित पोस्ट पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर पदाधिकारियों की अनुमति या सहमति के बिना प्रकाशित की गई थी। पार्टी की तरफ से इस पोस्ट के लिए बिना शर्त माफी भी मांगी गई है। वकील ने यह भी बताया कि अगले ही दिन प्रेस विज्ञप्ति जारी कर स्थिति स्पष्ट की गई थी और विवादित पोस्ट को सोशल मीडिया से हटा दिया गया था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट इन दलीलों से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आया। पीठ ने साफ किया कि नोटिस किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केरलम कांग्रेस के सभी पदाधिकारियों को जवाब देना होगा। अदालत ने माफी की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि वह यह भी देखेगी कि हलफनामा केवल औपचारिकता के लिए तैयार किया गया है या उसमें वास्तव में पछतावे की भावना मौजूद है। पीठ ने कहा कि माफी की गंभीरता और उसकी सच्चाई का मूल्यांकन करने के बाद ही आगे की कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि न्यायिक फैसलों की आलोचना करना किसी भी नागरिक और राजनीतिक दल का अधिकार हो सकता है, लेकिन आलोचना के नाम पर न्यायपालिका के कामकाज में बाधा डालना या उसकी संस्थागत प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका को अपनी स्वतंत्रता और अधिकार बनाए रखने के लिए किसी राजनीतिक दल के समर्थन की आवश्यकता नहीं है। उसकी वास्तविक शक्ति संविधान और कानून के शासन से आती है। पीठ ने चेतावनी दी कि न्यायालय की गरिमा को कमजोर करने की कोशिश करने वाले व्यक्ति या संगठन के प्रभाव और राजनीतिक हैसियत को देखकर कार्रवाई तय नहीं की जाएगी। अदालत ने कहा कि उसका संयम उसकी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। दरअसल, यह पूरा विवाद 12 अक्टूबर को शुरू हुआ था। आरोप है कि केरल कांग्रेस के आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट से मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी वाली पोस्ट साझा की गई थी। इस पोस्ट को लेकर विवाद खड़ा हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में पहुंचा। इसके बाद अदालत में संभावित अवमानना की कार्रवाई को लेकर सुनवाई शुरू हुई।

अब सुप्रीम कोर्ट ने केरलम कांग्रेस के सभी पदाधिकारियों से जवाब मांगा है। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि विवादित पोस्ट किस परिस्थिति में प्रकाशित हुई और इसकी जिम्मेदारी किसकी थी। साथ ही पार्टी को अपने हलफनामे के माध्यम से यह बताना होगा कि उसकी ओर से मांगी गई माफी कितनी गंभीर और वास्तविक है। इस मामले पर आगे होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत का अगला कदम कांग्रेस पदाधिकारियों के जवाब, प्रस्तुत हलफनामे और माफी के स्वरूप पर निर्भर करेगा। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख से यह स्पष्ट कर दिया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के साथ न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का सम्मान भी जरूरी है।


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