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गुलमोहर ग्रीन्स सोसायटी पर हाईकोर्ट सख्त, दो टावर गिरेंगे, बिल्डर पर 25 लाख जुर्माना

जांच में जमीन के मालिकाना हक को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद 3 जुलाई 2010 को मूल नक्शा रद्द कर दिया गया। इसके बावजूद निर्माण जारी रहने और बाद में शमन प्रक्रिया के जरिए अतिरिक्त निर्माण को मंजूरी दिए जाने पर विवाद बढ़ता गया। वर्ष 2011 में संशोधित मंजूरी के दौरान 720 मौजूदा फ्लैटों के...

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  • October 28, 2026 12:00 pm IST, Published 2 hours ago

गाजियाबाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद की गुलमोहर ग्रीन्स आवासीय सोसायटी में अवैध निर्माण के मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए बिल्डर के खिलाफ बड़ा आदेश दिया है। अदालत ने सोसायटी के टावर नंबर 27 और 28 को पूरी तरह ध्वस्त करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा टावर नंबर 16, 17, 18 और 19 की नौवीं और दसवीं मंजिल को भी गिराने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने बिल्डर पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाने के साथ ही गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (GDA) को प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये की कानूनी लागत देने का निर्देश दिया है।

जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने 95 पन्नों के फैसले में निर्माण की मंजूरी देने और बाद में अवैध निर्माण पर प्रभावी कार्रवाई नहीं करने को लेकर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने निर्देश दिया कि संबंधित अतिरिक्त मंजिलों को दो महीने के भीतर हटाया जाए। टावर 27 और 28 को ध्वस्त करने की कार्रवाई भी प्राधिकरण को करनी होगी। इस दौरान जिला प्रशासन और पुलिस को जीडीए के अधिकारियों को जरूरी सुरक्षा और सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।

अदालत ने ध्वस्तीकरण पर आने वाले खर्च की वसूली बिल्डर से भू-राजस्व के बकाये की तरह करने की अनुमति भी दी है। इसके साथ ही बिल्डर को फैसले की तारीख से एक महीने के भीतर 25 लाख रुपये गुलमोहर ग्रीन्स रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन के खाते में जमा कराने होंगे। वहीं, प्रत्येक याचिकाकर्ता को दो महीने के भीतर 50 हजार रुपये की लागत का भुगतान किया जाना है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जीडीए के अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अदालत के अनुसार, अधिकारियों की लापरवाही और प्रमोटर के साथ कथित मिलीभगत के कारण सोसायटी के निवासियों को परेशानी झेलनी पड़ी और अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। अदालत ने माना कि इस मामले में बिल्डर पर आर्थिक दंड लगाना उचित है, ताकि अवैध निर्माण के कारण प्रभावित लोगों को राहत मिल सके।

इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2005-2006 के दौरान हुई थी। बिल्डर ने साहिबाबाद के मोहन नगर क्षेत्र में 95 कटोरी मिल, ग्राम करहेड़ा की जमीन पर 34 टावर और 904 फ्लैट बनाने के लिए 29 मई 2006 को जीडीए से नक्शा मंजूर कराया था। बाद में हिंडन एयरफोर्स स्टेशन के अधिकारियों ने जमीन के एक हिस्से पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि संबंधित आठ खसरा नंबरों की जमीन का अधिग्रहण केंद्र सरकार वर्ष 1962 में ही कर चुकी थी।

जांच में जमीन के मालिकाना हक को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आने के बाद 3 जुलाई 2010 को मूल नक्शा रद्द कर दिया गया। इसके बावजूद निर्माण जारी रहने और बाद में शमन प्रक्रिया के जरिए अतिरिक्त निर्माण को मंजूरी दिए जाने पर विवाद बढ़ता गया। वर्ष 2011 में संशोधित मंजूरी के दौरान 720 मौजूदा फ्लैटों के अतिरिक्त 374 फ्लैट शामिल किए गए, जिससे कुल संख्या 1094 हो गई। इसके बाद भी निर्माण में बदलाव होते रहे। वर्ष 2015 में कुछ टावरों की मंजिलें बढ़ाने की अनुमति दी गई, जबकि टावर 16 से 19 में अतिरिक्त मंजिलें और टावर 27 तथा 28 में नए निर्माण को लेकर भी विवाद सामने आया। 18 दिसंबर 2024 को तीसरी शमन प्रक्रिया के तहत इन निर्माणों को मंजूरी दिए जाने पर मामला अदालत पहुंचा।

हाईकोर्ट ने पाया कि वायुसेना की 4560 वर्ग मीटर जमीन को बिल्डर के कुल भूखंड में शामिल दिखाकर फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की गणना की गई थी। पुराने न्यायिक रिकॉर्ड और जमीन अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेजों की जांच में स्पष्ट हुआ कि इस जमीन पर बिल्डर का अधिकार नहीं था। अदालत के मुताबिक, संबंधित जमीन को भूखंड से हटाने पर तीसरी शमन मंजूरी के लिए आवश्यक एफएआर उपलब्ध नहीं रहता। इसी आधार पर मंजूरी को अवैध माना गया।

इस फैसले को आवासीय परियोजनाओं में नियमों के पालन और सरकारी प्राधिकरणों की जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत के आदेश से प्रभावित निवासियों को आर्थिक राहत मिलने के साथ अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता भी साफ हुआ है।

 

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