मेरठ: अवैध निर्माण और अनधिकृत कॉलोनियों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को चिन्हित अवैध संरचनाओं के खिलाफ तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। अदालत के सामने रखी गई स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक मेरठ के जोन-ए में 16,726 ऐसी संरचनाओं की पहचान की गई है, जिनके संबंध में कार्रवाई की जानी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन को बिना अनावश्यक देरी के कदम उठाने होंगे।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने मेरठ में अवैध निर्माण से जुड़ी स्थिति रिपोर्ट पर विचार किया। रिपोर्ट में शहर को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर किए गए सर्वेक्षण का विवरण सामने रखा गया। अदालत ने अवैध निर्माण और अनधिकृत कॉलोनियों के विस्तार को गंभीर विषय माना और अधिकारियों को कार्रवाई की प्रक्रिया तेज करने के निर्देश दिए।
सर्वेक्षण के दौरान चिन्हित 16,726 संरचनाओं में अलग-अलग प्रकार के निर्माण शामिल हैं। इनमें 12,907 आवासीय संरचनाएं, 874 ऐसी इमारतें शामिल हैं जिनका इस्तेमाल आवासीय और व्यावसायिक दोनों रूप में किया जा रहा है, जबकि 2,945 निर्माण गैर-आवासीय श्रेणी में बताए गए हैं। यह आंकड़ा मेरठ में अनधिकृत निर्माण की व्यापकता को दर्शाता है और इसी के आधार पर अदालत ने प्रशासन से प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कार्रवाई के तरीके को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अदालत के अनुसार संबंधित परिसरों को पहले खाली कराया जाना है और उसके बाद उन्हें सील करने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। चिन्हित सभी 16,726 संरचनाओं के संबंध में सीलिंग की कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत का जोर इस बात पर है कि प्रशासनिक कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रहे, बल्कि जमीन पर भी प्रभावी रूप से दिखाई दे।अदालत ने इस मामले में संभावित सुरक्षा जोखिम का भी उल्लेख किया। ऐसी इमारतों के कमजोर होने या अचानक गिरने की स्थिति में लोगों की जान को खतरा हो सकता है।
मेरठ में अनधिकृत निर्माण का मुद्दा लंबे समय से प्रशासनिक और न्यायिक निगरानी के दायरे में रहा है। अवैध तरीके से आवासीय संपत्तियों का व्यावसायिक इस्तेमाल, बिना स्वीकृति निर्माण और अनधिकृत कॉलोनियों का विस्तार शहरी नियोजन के लिए चुनौती बनता है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश इसी व्यापक समस्या के संदर्भ में आया है। अदालत के निर्देशों के बाद अब उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित स्थानीय प्राधिकरणों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। उन्हें चिन्हित परिसरों की स्थिति की जांच, उन्हें खाली कराने और सील करने की कार्रवाई आगे बढ़ानी होगी। जहां निर्माण सुरक्षा के लिहाज से जोखिमपूर्ण हैं, वहां संभावित दुर्घटना को रोकने के लिए भी आवश्यक कदम उठाने होंगे।
मेरठ की मौजूदा स्थिति से यह सवाल भी सामने आता है कि शहरों में निर्माण गतिविधियों की निगरानी और नियोजन व्यवस्था कितनी प्रभावी है। अनधिकृत कॉलोनियों के विस्तार को शुरुआती स्तर पर रोकना स्थानीय प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाद में ऐसे निर्माणों पर कार्रवाई करना अधिक जटिल हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब कार्रवाई की प्रगति पर नजर रहेगी। 16,726 चिन्हित संरचनाओं के संबंध में प्रशासन को अदालत के निर्देशों के मुताबिक कदम उठाने होंगे। साथ ही यह सुनिश्चित करना होगा कि संभावित जर्जर और जोखिमपूर्ण इमारतों के कारण किसी तरह की जनहानि न हो। अदालत की सख्ती के बाद मेरठ में अवैध निर्माण के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई तेज होने की संभावना है।