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भारत में तेजी से फैल रहा जहरीला ‘चाइनीज स्टेलरा’, हिमालयी पर्यावरण पर मंडरा रहा बड़ा खतरा

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में एक खतरनाक विदेशी पौधे “चाइनीज स्टेलरा” की मौजूदगी ने वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। देखने में आकर्षक और फूलों से भरा यह पौधा वास्तव में बेहद जहरीला माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह पौधा अपने आसपास ऐसे रसायन छोड़ता है, जो दूसरे पौधों […]

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  • May 21, 2026 11:05 am IST, Published 3 hours ago

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में एक खतरनाक विदेशी पौधे “चाइनीज स्टेलरा” की मौजूदगी ने वैज्ञानिकों और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। देखने में आकर्षक और फूलों से भरा यह पौधा वास्तव में बेहद जहरीला माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह पौधा अपने आसपास ऐसे रसायन छोड़ता है, जो दूसरे पौधों और घास को धीरे-धीरे नष्ट कर देते हैं। इससे स्थानीय वनस्पतियों और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

हाल ही में उत्तराखंड के आदि कैलाश और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों में इस पौधे के कई नमूने देखे गए हैं। माना जा रहा है कि यह प्रजाति चीन और मध्य एशिया से यहां पहुंची है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पौधा तेजी से फैलने की क्षमता रखता है और यदि समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह हिमालयी पारिस्थितिकी के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।

वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक चाइनीज स्टेलरा की सबसे बड़ी समस्या इसकी “रासायनिक आक्रामकता” है। यह मिट्टी में ऐसे तत्व छोड़ता है जिससे आसपास उगने वाले दूसरे पौधे कमजोर पड़ जाते हैं। धीरे-धीरे पूरा क्षेत्र इसी पौधे से भरने लगता है। इससे घास के मैदान, दुर्लभ जड़ी-बूटियां और स्थानीय वनस्पतियां खत्म होने लगती हैं। इसका असर पशुओं के चारे और पहाड़ी जैव विविधता पर भी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि विदेशी और आक्रामक पौधों की बढ़ती संख्या हिमालयी क्षेत्रों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के कारण ऐसे पौधों को नए क्षेत्रों में फैलने का मौका मिल रहा है। वैज्ञानिक अब इस पौधे की प्रकृति, फैलाव और पर्यावरण पर इसके प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं।

पर्यावरणविदों ने सरकार और वन विभाग से मांग की है कि प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई जाए और समय रहते नियंत्रण के उपाय किए जाएं। यदि इसे शुरुआती स्तर पर नहीं रोका गया, तो आने वाले वर्षों में यह पौधा हिमालयी पारिस्थितिकी संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।

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