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दिल्ली में विपक्षी नेताओं के प्रदर्शन पर दिलीप घोष का तंज, फंडिंग को लेकर लगाए आरोप

दिल्ली में विपक्षी नेताओं के जुटने और विरोध प्रदर्शन करने के मुद्दे पर भी दिलीप घोष ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ नेताओं के पासफिलहाल जनता के बीच दिखाने के लिए कोई ठोस काम नहीं है। उनके अनुसार, चुनावों में बार-बार…

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  • October 11, 2026 11:55 am IST, Published 56 minutes ago

कोलकाताः पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री दिलीप घोष ने अरविंद केजरीवाल के बयान और दिल्ली में विपक्षी नेताओं की ओर से किए जा रहे विरोध प्रदर्शनको लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि किसी के साथ जोर-जबरदस्ती नहीं की जा रही है और जब मामला अदालत में लंबित है, तो सभी पक्षों को न्यायपालिका पर भरोसा रखना चाहिए। घोष ने विपक्षी नेताओं पर राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए प्रदर्शन करने का आरोपलगाते हुए कहा कि केवल हंगामा और ड्रामा करने से राजनीति नहीं चलती। उनके बयान से राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर सियासी बहसतेज होने के संकेत हैं।

दिलीप घोष ने अरविंद केजरीवाल के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि संबंधित मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है। ऐसे में अदालत के फैसलेका इंतजार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब किसी पक्ष को सरकार पर भरोसा नहीं होता और वह न्याय के लिए अदालत का दरवाजाखटखटाता है, तो उसे न्यायपालिका पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। घोष ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जनता का भरोसा हासिल करने के लिए केवल आरोप लगाने या विरोध प्रदर्शन करने से काम नहीं चलता। उनके मुताबिक, राजनीतिक दलों को अपने काम और जनता केबीच अपनी स्वीकार्यता के आधार पर समर्थन हासिल करना चाहिए।

मंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि इतिहास में समय-समय पर राजनीतिक परिस्थितियां बदलती रही हैं और आने वाले समय में भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं। उन्होंने विपक्ष की मौजूदा रणनीति पर सवाल उठाते हुए संकेत दिया कि राजनीतिक दलों को अपने अस्तित्व औरजनसमर्थन को लेकर आत्ममंथन करना चाहिए। घोष के बयान को विपक्ष की गतिविधियों पर सीधे हमले के तौर पर देखा जा रहा है।

दिल्ली में विपक्षी नेताओं के जुटने और विरोध प्रदर्शन करने के मुद्दे पर भी दिलीप घोष ने कड़ी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कुछ नेताओं के पास फिलहाल जनता के बीच दिखाने के लिए कोई ठोस काम नहीं है। उनके अनुसार, चुनावों में बार-बार जनता की ओर से नकारे जाने के बाद कुछनेता अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने के लिए इस तरह के कार्यक्रमों का सहारा लेते हैं। घोष ने आरोप लगाया कि दिल्ली में नेताओं का एकत्र होना और हंगामा करना मीडिया में बने रहने की कोशिश का हिस्सा है।

हालांकि, इन टिप्पणियों के समर्थन में उन्होंने सार्वजनिक रूप से कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने अपने बयान में यह आरोप भीलगाया कि प्रदर्शन में शामिल लोगों के रहने, खाने-पीने, यात्रा और अन्य गतिविधियों पर होने वाले खर्च के लिए किसी बाहरी संस्था या देश सेवित्तीय सहायता मिलती है। घोष ने कहा कि सरकार इस तरह की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। उनके इस दावे को लेकर संबंधित पक्षों कीप्रतिक्रिया और किसी स्वतंत्र पुष्टि का उल्लेख उपलब्ध बयान में नहीं है। इसलिए इस आरोप को मंत्री के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

दिलीप घोष ने अनशन और विरोध प्रदर्शन के उद्देश्य पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि अनशन जैसे लोकतांत्रिक तरीकों का इस्तेमालकिसी सार्थक उद्देश्य के लिए होना चाहिए। उदाहरण देते हुए उन्होंने महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन का जिक्र किया और कहा कि गांधी जीने देश की आजादी के लिए अनशन को एक प्रभावी माध्यम बनाया था। उनके मुताबिक, विरोध का उद्देश्य जनहित और किसी व्यापक सामाजिकया राष्ट्रीय मुद्दे को आगे बढ़ाना होना चाहिए।

मंत्री ने आरोप लगाया कि वर्तमान समय में कुछ लोग अनशन का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक छवि चमकाने या सरकार पर दबाव बनाने के लिएकरते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि इस तरह की राजनीति आखिर कब तक जारी रहेगी। उनके बयान में विपक्षी दलों की रणनीति, विरोध प्रदर्शनके उद्देश्यों और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर असहमति साफ दिखाई दी।

दिलीप घोष की इन टिप्पणियों से सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी तेज होने की संभावना है। एक ओर मंत्री ने अदालत की प्रक्रिया कासम्मान करने और विरोध प्रदर्शनों के उद्देश्य पर सवाल उठाए, वहीं दूसरी ओर उनके वित्तीय सहायता संबंधी आरोपों ने भी राजनीतिक चर्चा कोनया मुद्दा दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में संबंधित नेताओं का पक्ष, आरोपों के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया से जुड़ीआधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल घोष के बयान ने राजनीतिक माहौल में आरोप-प्रत्यारोप को और तीखा कर दिया है।

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