बीजिंग। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) दुनिया भर में उद्योगों, सेवाओं और कारोबार के तरीके को तेजी से बदल रही है। जहां एक ओर इसे भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके कारण रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता भी लगातार बढ़ रही है। चीन से सामने आई एक नई रिपोर्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि AI और ऑटोमेशन के बढ़ते इस्तेमाल ने कई पारंपरिक नौकरियों को प्रभावित किया है, जिससे लाखों कर्मचारियों के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।
हाल के वर्षों में चीन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और ऑटोमेशन को तेजी से अपनाया है। विनिर्माण उद्योग, परिवहन, ग्राहक सेवा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर AI आधारित तकनीकों का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कंपनियों की उत्पादकता और दक्षता तो बढ़ी है, लेकिन दूसरी ओर मानव श्रम की आवश्यकता कई क्षेत्रों में कम होती जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, चीन के कुछ शहरों में ड्राइवरलेस टैक्सी सेवाएं शुरू होने के बाद पारंपरिक टैक्सी चालकों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया था। हालांकि बाद में कुछ स्वचालित टैक्सियों के संचालन में तकनीकी समस्याएं सामने आने के बाद कई सेवाओं को अस्थायी रूप से रोका गया और जांच शुरू की गई। इस दौरान कुछ ड्राइवरों को फिर से काम मिलने की खबरें भी सामने आईं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि नई तकनीक के साथ सुरक्षा और विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
इसी तरह AI आधारित चैटबॉट और वर्चुअल असिस्टेंट के बढ़ते उपयोग ने कॉल सेंटर और ग्राहक सेवा क्षेत्र में भी बदलाव ला दिया है। कई कंपनियां अब सामान्य ग्राहक प्रश्नों के उत्तर देने के लिए AI सिस्टम का उपयोग कर रही हैं। इससे लागत कम हो रही है और सेवाएं तेज हो रही हैं, लेकिन मानव कर्मचारियों की आवश्यकता कम होने की आशंका भी बढ़ी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि AI केवल कम कौशल वाली नौकरियों को ही नहीं, बल्कि कई मध्यम स्तर की पेशेवर भूमिकाओं को भी प्रभावित कर सकता है। डेटा प्रोसेसिंग, कंटेंट तैयार करना, तकनीकी सहायता और प्रशासनिक कार्य जैसे कई क्षेत्रों में AI आधारित सिस्टम तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। ऐसे में कर्मचारियों के लिए नई तकनीकों के अनुरूप कौशल विकसित करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी हाल ही में AI के विषय पर आयोजित एक वैश्विक सम्मेलन में कहा था कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास पूरी मानवता की साझा समृद्धि और सामूहिक सुरक्षा के लिए होना चाहिए। उन्होंने AI के जिम्मेदार और संतुलित उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि तकनीक का उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि समाज के व्यापक हितों की रक्षा भी होना चाहिए।
हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि चीन का श्रम बाजार पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। युवाओं में बेरोजगारी, आर्थिक सुस्ती और पारंपरिक उद्योगों में धीमी वृद्धि जैसी समस्याओं के बीच AI का तेज विस्तार नई चिंताओं को जन्म दे रहा है। कई कर्मचारी स्थायी नौकरियां छोड़कर गिग इकोनॉमी की ओर बढ़ रहे हैं, जहां आय निश्चित नहीं होती और सामाजिक सुरक्षा भी सीमित रहती है।
एक थिंक-टैंक के अनुमान के अनुसार, चीन में फ्लेक्सिबल या अस्थायी रोजगार करने वाले लोगों की संख्या इस वर्ष लगभग 32 करोड़ तक पहुंच सकती है। वर्ष 2019 में यह आंकड़ा करीब 16 करोड़ था। अनुमान है कि यह संख्या चीन की कुल कार्यबल का लगभग 44 प्रतिशत हो सकती है। यह बदलाव बताता है कि रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और पारंपरिक स्थायी नौकरियों की जगह अस्थायी एवं डिजिटल कार्यों का विस्तार हो रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि AI को पूरी तरह रोजगार का दुश्मन मानना भी उचित नहीं होगा। इतिहास बताता है कि हर नई तकनीक कुछ नौकरियां खत्म करती है, लेकिन साथ ही नए अवसर भी पैदा करती है। AI के कारण डेटा साइंस, मशीन लर्निंग, साइबर सिक्योरिटी, रोबोटिक्स, AI ट्रेनिंग और डिजिटल मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में नई नौकरियों की मांग तेजी से बढ़ सकती है।
विशेषज्ञ सरकारों और कंपनियों को सलाह दे रहे हैं कि कर्मचारियों के लिए री-स्किलिंग और अप-स्किलिंग कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए ताकि वे बदलती तकनीकी जरूरतों के अनुसार खुद को तैयार कर सकें। यदि समय रहते कौशल विकास पर ध्यान दिया गया तो AI रोजगार संकट की बजाय आर्थिक विकास का बड़ा अवसर भी बन सकता है।
दुनिया भर के देश अब इस चुनौती और अवसर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। चीन का अनुभव यह संकेत देता है कि AI का विस्तार केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक नीति का भी महत्वपूर्ण विषय है। आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकारें, उद्योग और कर्मचारी मिलकर इस तकनीकी बदलाव को किस तरह अपनाते हैं। फिलहाल इतना तय है कि AI भविष्य की दिशा तय करेगा, लेकिन यह भविष्य कितना समावेशी होगा, यह नीति, कौशल विकास और जिम्मेदार तकनीकी उपयोग पर निर्भर करेगा।