नई दिल्ली: अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म Satluj की रिलीज के बाद एक बार फिर मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का नाम राष्ट्रीय चर्चा में है। फिल्म को खालड़ा के जीवन और उनके संघर्ष से प्रेरित बताया जा रहा है। हालांकि फिल्म को लेकर कानूनी और सेंसर संबंधी विवाद भी सामने आए, लेकिन इसके साथ ही पंजाब के उन घटनाक्रमों पर भी फिर से चर्चा शुरू हो गई, जिन्होंने देश के न्यायिक और मानवाधिकार इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
6 सितंबर 1995 की सुबह अमृतसर स्थित अपने घर के बाहर जसवंत सिंह खालड़ा कार साफ कर रहे थे। इसी दौरान कथित तौर पर कुछ पुलिसकर्मी उन्हें अपने साथ ले गए। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से फिर कभी दिखाई नहीं दिए।
उस समय पंजाब आतंकवाद और उग्रवाद के दौर से गुजर रहा था। खालड़ा उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने कथित फर्जी मुठभेड़ों, लापता लोगों और अज्ञात शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े मामलों को सार्वजनिक रूप से उठाया था। उनके दावों ने राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस छेड़ दी थी।
घटना के कुछ दिनों बाद इस मामले की जानकारी एक टेलीग्राम के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने इसे बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) याचिका के रूप में स्वीकार किया और पंजाब सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगा। बाद में खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने भी संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर अपने पति को अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंपी। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में पंजाब पुलिस के कुछ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए और उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की। जांच के दौरान उन आरोपों की भी पड़ताल की गई जिनमें बड़ी संख्या में शवों का कथित तौर पर “अज्ञात” के रूप में अंतिम संस्कार किए जाने का दावा किया गया था। बाद में यह मामला राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के समक्ष भी पहुंचा, जहां पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने सहित कई पहलुओं पर विचार किया गया।
करीब डेढ़ दशक तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दोषी ठहराए गए पंजाब पुलिस के पांच अधिकारियों को दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में कानून के शासन और आम नागरिकों के न्याय व्यवस्था पर विश्वास को बनाए रखना बेहद आवश्यक है।
फिल्म ‘सतलुज’ के माध्यम से खालड़ा की कहानी एक बार फिर लोगों के बीच पहुंची है। फिल्म पहले अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाई जाने वाली थी, लेकिन कानूनी और सेंसर प्रक्रियाओं के कारण इसकी रिलीज में देरी हुई। हाल में इसके प्रदर्शन और डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाए जाने को लेकर भी बहस छिड़ी।