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शादी जैसे लिव-इन रिश्तों में भी लागू हो सकती है धारा 498A

नई दिल्ली: बदलते सामाजिक परिवेश और रिश्तों की नई परिभाषाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई लिव-इन संबंध विवाह की प्रकृति का है और दोनों पक्षों के बीच शादी करने की स्पष्ट मंशा रही है, तो ऐसे मामलों में महिला के साथ क्रूरता […]

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Supreme Court on WomenRights
Gauravshali Bharat News
  • August 3, 2026 2:55 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: बदलते सामाजिक परिवेश और रिश्तों की नई परिभाषाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई लिव-इन संबंध विवाह की प्रकृति का है और दोनों पक्षों के बीच शादी करने की स्पष्ट मंशा रही है, तो ऐसे मामलों में महिला के साथ क्रूरता के आरोप पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) के तहत आपराधिक कार्रवाई की जा सकती है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि कानून का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा और मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना है। इसलिए केवल इस आधार पर किसी महिला को कानूनी संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका संबंध पारंपरिक कानूनी विवाह के बजाय विवाह जैसे लिव-इन रिश्ते का था।

अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि हर लिव-इन संबंध अपने आप धारा 498A के दायरे में नहीं आएगा। इसके लिए महिला को यह साबित करना होगा कि दोनों पक्ष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे थे, उनका संबंध विवाह जैसा था और दोनों के बीच भविष्य में विवाह करने की वास्तविक मंशा मौजूद थी। पीठ ने कहा कि यदि ऐसा संबंध केवल अस्थायी या अनौपचारिक था, तो इस प्रावधान का स्वतः लाभ नहीं मिलेगा। प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर अदालत यह तय करेगी कि संबंध वास्तव में विवाह की प्रकृति का था या नहीं।

यह मामला कर्नाटक से जुड़ा है। महिला ने आरोप लगाया था कि एक व्यक्ति ने अपनी पहली शादी की जानकारी छिपाकर उससे विवाह किया और बाद में उसके साथ दहेज उत्पीड़न, मानसिक और शारीरिक क्रूरता की गई। महिला ने जान से मारने की कोशिश जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे। आरोपी ने अदालत में दलील दी कि दूसरी शादी कानूनी रूप से वैध नहीं थी, इसलिए उसे “पति” नहीं माना जा सकता और उसके खिलाफ धारा 498A लागू नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि कानून की व्याख्या समाज में बदलते संबंधों और महिलाओं की सुरक्षा के उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि यदि केवल वैधानिक विवाह वाली महिलाओं को ही आपराधिक कानून का संरक्षण मिले और विवाह जैसी परिस्थितियों में रहने वाली महिलाओं को नहीं, तो यह समानता के सिद्धांत के विपरीत होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 पहले से ही विवाह जैसे लिव-इन संबंधों को मान्यता देता है, लेकिन वह मुख्य रूप से नागरिक (सिविल) राहत प्रदान करता है, जैसे निवास का अधिकार, भरण-पोषण और संरक्षण आदेश। वहीं आईपीसी की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) आपराधिक जिम्मेदारी तय करती है और दोष सिद्ध होने पर आरोपी को तीन वर्ष तक की सजा तथा जुर्माना हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य फैसले का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस बिना पर्याप्त जांच और कानूनी प्रक्रिया अपनाए सीधे गिरफ्तारी न करे। जांच एजेंसियों को निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य होगा, ताकि कानून का दुरुपयोग भी न हो और वास्तविक पीड़ितों को न्याय भी मिल सके।

यह फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था में बदलते सामाजिक संबंधों को स्वीकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आज बड़ी संख्या में लोग विवाह से पहले या बिना औपचारिक विवाह के साथ रह रहे हैं। ऐसे में यदि किसी महिला को गंभीर उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो केवल रिश्ते की तकनीकी स्थिति के आधार पर उसे कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले में तथ्यों की अलग-अलग जांच होगी और केवल लिव-इन संबंध होने मात्र से धारा 498A या बीएनएस की धारा 85 स्वतः लागू नहीं होगी। संबंध की प्रकृति, दोनों पक्षों का आचरण और विवाह की मंशा जैसे पहलुओं का मूल्यांकन अदालत करेगी।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। इससे एक ओर महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी, वहीं जांच एजेंसियों और अदालतों के लिए भी स्पष्ट कानूनी दिशा-निर्देश उपलब्ध होंगे।

 

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