नई दिल्ली: प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस विधेयक का खुलकर विरोध करते हुए विपक्षी दलों से संसद के भीतर और बाहर एकजुट होकर इसका विरोध करने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि यह विधेयक मौजूदा स्वरूप में कानून बनता है, तो देश में सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य कर रहे अनेक गैर-सरकारी संस्थानों पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक संदेश साझा करते हुए कहा कि प्रस्तावित कानून पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। उन्होंने अपने एक लेख का हवाला देते हुए लिखा कि भारत के विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में दशकों से योगदान देने वाले संस्थानों को कठोर कानूनी दायरे में लाना उचित नहीं होगा। उन्होंने विपक्षी दलों से अपील की कि लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक समाज की भूमिका को सुरक्षित रखने के लिए इस विधेयक का संगठित तरीके से विरोध किया जाए।
थरूर ने आरोप लगाया कि प्रस्तावित संशोधन कार्यपालिका के अधिकारों को अत्यधिक बढ़ाने वाला कदम है। उनके अनुसार यदि यह कानून लागू होता है तो सरकार और नागरिक समाज संगठनों के बीच संबंधों की प्रकृति में बड़ा बदलाव आ सकता है। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में गैर-सरकारी संस्थाएं सरकार की विरोधी नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया की भागीदार होती हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में कई गैर-लाभकारी संस्थाओं, थिंक टैंकों और मानवाधिकार संगठनों को संदेह की दृष्टि से देखा गया है। उनके अनुसार इससे ऐसे संगठनों की कार्यक्षमता प्रभावित हुई है, जो लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
In my latest #TharoorThink column in the @indianExpress, I take on the new FCRA bill, urging it be resisted. “It is a profound injustice to subject institutions that have devoted generations to India’s development, education, and healthcare to such punitive statutory mechanisms”,… pic.twitter.com/C8WbeSNefn
— Shashi Tharoor (@ShashiTharoor) August 6, 2026
कांग्रेस सांसद का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाले संगठनों पर नियमों के सख्त होने से हजारों संस्थाओं का काम प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि विदेशी फंडिंग में भारी गिरावट आई है और अनेक छोटे सामाजिक संगठनों को अपना काम सीमित करना पड़ा या बंद करना पड़ा।
थरूर ने आशंका जताई कि यदि प्रस्तावित संशोधन कानून का रूप लेता है तो संबंधित एजेंसियों को और व्यापक अधिकार मिल सकते हैं, जिससे कई संस्थाओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने कहा कि इस विषय पर संसद में व्यापक चर्चा होनी चाहिए ताकि सभी पक्षों की राय सामने आ सके।
केरल का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद होने के नाते थरूर ने कहा कि उन्होंने अपने राज्य में कई दशकों से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका देखी है। उनके अनुसार अनेक ट्रस्ट, स्कूल, अस्पताल और सेवा संस्थान बिना किसी भेदभाव के समाज के कमजोर वर्गों तक सेवाएं पहुंचाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे संस्थानों के कामकाज पर अनिश्चितता बढ़ती है तो इसका असर केवल संस्थाओं पर ही नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों पर भी पड़ेगा जो उनकी सेवाओं पर निर्भर हैं।
थरूर ने प्रस्तावित विधेयक को लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा विषय बताते हुए विपक्षी दलों से आग्रह किया कि वे राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर इस मुद्दे पर साझा रणनीति बनाएं। उनका कहना है कि संसद लोकतांत्रिक विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण मंच है और ऐसे विधेयकों पर विस्तृत बहस होना आवश्यक है।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि विदेशी अंशदान से जुड़े कानूनों का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, धन के उपयोग की निगरानी सुनिश्चित करना और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। सरकार का तर्क रहा है कि नियमों का पालन करने वाले संगठनों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी तथा कानून केवल जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए जा रहे हैं।
गृह मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2019 से 2022 के बीच हजारों संगठनों को विदेशों से बड़ी मात्रा में आर्थिक सहायता प्राप्त हुई। वहीं एफसीआरए पोर्टल के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक हजारों संस्थाओं के सक्रिय पंजीकरण मौजूद थे, जबकि बड़ी संख्या में पंजीकरण रद्द या समाप्त भी हो चुके हैं। इन आंकड़ों के आधार पर सरकार और विपक्ष दोनों अपने-अपने तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में इस विधेयक पर क्या चर्चा होती है और क्या सरकार विपक्ष की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए किसी संशोधन पर विचार करती है। फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर व्यापक बहस का विषय बन चुका है।