नई दिल्ली। दुष्कर्म मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे नारायण साईं को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली है। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी सजा पर रोक लगाने और जमानत देने की मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट से लंबित आपराधिक अपील का यथासंभव तीन महीने के भीतर निस्तारण करने का अनुरोध किया है।
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि फिलहाल मामले के गुण-दोष पर विचार करना उचित नहीं होगा, क्योंकि संबंधित अपील पहले से गुजरात हाईकोर्ट में लंबित है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित अवधि में अपील का निस्तारण नहीं हो पाता है, तो याचिकाकर्ता दोबारा सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान नारायण साईं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि अपील के शीघ्र निस्तारण के लिए आवेदन पहले ही दाखिल किया जा चुका है, लेकिन उस पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि मामले को कई वर्ष बीत चुके हैं और अपील लंबित रहने के कारण सजा पर रोक लगाने पर विचार किया जाना चाहिए। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क रखा कि पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय ने मामले को गुण-दोष के आधार पर सुनने का निर्देश दिया था, लेकिन अब तक उस दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष अपनी सभी दलीलें पूरी मजबूती से रखें। पीठ ने संकेत दिया कि उच्च न्यायालय को अपील की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर पूरी करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि लंबे समय से लंबित मामला शीघ्र अंतिम निष्कर्ष तक पहुंच सके।
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि राज्य सरकार भी अपील के शीघ्र निस्तारण के पक्ष में है, इसलिए इस स्तर पर सजा पर रोक लगाने या मामले के तथ्यों पर विस्तार से विचार करना उचित नहीं होगा। अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह उपलब्ध परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तीन महीने के भीतर अपील का निर्णय करने का प्रयास करे।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि अपील की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता और राज्य सरकार दोनों पक्षों को पूरा सहयोग करना चाहिए, ताकि प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो। अदालत ने मौखिक रूप से यह भी टिप्पणी की कि यदि तीन महीने बाद भी मामला लंबित रहता है, तो आवश्यक होने पर दोनों पक्ष फिर से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आ सकते हैं।
यह मामला वर्ष 2013 के दुष्कर्म प्रकरण से जुड़ा है। इस मामले में सूरत की एक अदालत ने वर्ष 2019 में नारायण साईं को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसके बाद उन्होंने अपनी दोषसिद्धि और सजा को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी, जहां अपील अभी भी विचाराधीन है।
इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट ने मई 2026 में नारायण साईं की अंतरिम जमानत और अपील के अंतिम निर्णय तक सजा निलंबित करने की मांग खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि प्रथम दृष्टया रिकॉर्ड के आधार पर ऐसा नहीं कहा जा सकता कि अपील में दोषसिद्धि पलटने की स्पष्ट संभावना है।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि गंभीर आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के बाद आरोपी को पहले जैसी निर्दोषता की धारणा का लाभ नहीं मिलता। अदालत ने केवल लंबे समय तक जेल में रहने को सजा निलंबित करने का पर्याप्त आधार मानने से भी इनकार किया था।
इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह टिप्पणी भी की थी कि अपील की सुनवाई में हुई देरी के लिए याचिकाकर्ता की ओर से दायर कई अंतरिम आवेदनों और प्रक्रियात्मक कारणों की भी भूमिका रही है। अदालत के अनुसार, अपील के अंतिम निस्तारण के बजाय बार-बार अलग-अलग राहत मांगने से भी प्रक्रिया लंबी हुई।