मुंबई। भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में वैश्विक शक्ति बनाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे बड़े डेटा केंद्रों के निर्माण को अब स्थानीय स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र के ठाणे और आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बड़े डेटा केंद्रों की प्रस्तावित परियोजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया है।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि घनी आबादी वाले इलाकों में बनाए जा रहे इन डेटा केंद्रों से जल स्रोतों, बिजली आपूर्ति और भूमि पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। हालांकि, संबंधित कंपनियों का कहना है कि परियोजनाओं में आधुनिक शीतलन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा और स्थानीय लोगों के पीने के पानी पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
ठाणे के बल्कुम और माजिवाड़ा इलाके में प्रस्तावित डेटा केंद्र करीब 53 से 58 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि ठाणे की बड़ी आबादी पहले से ही पानी की समस्या से जूझ रही है और कई परिवार पानी के टैंकरों पर निर्भर हैं।
विरोध अभियान का नेतृत्व कर रहीं साधना प्रधान का कहना है कि जब इलाके में पहले से ही पानी की कमी है, तो घनी आबादी वाले आवासीय क्षेत्र में इतने बड़े डेटा केंद्र के निर्माण की अनुमति क्यों दी जा रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे तकनीक या कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विरोधी नहीं हैं। उनकी आपत्ति इस बात को लेकर है कि इतनी बड़ी परियोजना को आवासीय क्षेत्र में स्थापित करने से स्थानीय आबादी और बुनियादी सुविधाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया है।
स्थानीय निवासियों की चिंता तब और बढ़ गई, जब उन्हें पता चला कि डेटा केंद्रों को आवश्यक सेवाओं की श्रेणी में रखा गया है। लोगों को आशंका है कि भविष्य में पानी और बिजली की कमी होने की स्थिति में इन केंद्रों को प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति मिल सकती है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि ऐसा हुआ तो पहले से पानी और बिजली की समस्या झेल रहे स्थानीय लोगों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
विरोध के बीच अमेजन की ओर से कहा गया है कि ठाणे में प्रस्तावित डेटा केंद्र में शीतलन व्यवस्था के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। कंपनी के अनुसार, भारत में उसके किसी भी डेटा केंद्र में शीतलन के लिए पानी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और इसके लिए स्थानीय पीने योग्य पानी का भी उपयोग नहीं किया जाता।
कंपनी ने बताया कि ठाणे डेटा केंद्र के लिए स्वीकृत जल आपूर्ति की मात्रा 0.01 एमएलडी है। इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कर्मचारियों के लिए पीने के पानी और शौचालय जैसी बुनियादी मानवीय जरूरतों के लिए किया जाएगा।
आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में भी प्रस्तावित बड़े डेटा केंद्र के खिलाफ स्थानीय नागरिक समूह और पर्यावरण कार्यकर्ता विरोध कर रहे हैं। यहां गूगल और अदानी समूह की ओर से प्रस्तावित कृत्रिम बुद्धिमत्ता डेटा केंद्र परिसर को लेकर लोगों में चिंता है।
यह परियोजना करीब एक गीगावाट क्षमता वाले बड़े समूह के रूप में विकसित की जानी है। इसे तीन अलग-अलग स्थानों पर स्थापित करने की योजना है। तारलुवाडा में करीब 200 एकड़, अदावीवरम-मुदसारलोवा में 120 एकड़ और अनाकापल्ली जिले के रामबिल्ली में करीब 160 एकड़ भूमि पर परियोजना विकसित किए जाने की योजना है।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना से भूमि, पानी और पर्यावरण पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंजूरियों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
इसी विरोध के तहत 19 जुलाई को 100 से अधिक लोगों ने सड़क पर उतरकर प्रदर्शन किया था।
यह विरोध ऐसे समय में सामने आया है, जब केंद्र सरकार भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल बुनियादी ढांचे का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में बड़े निवेश को बढ़ावा दे रही है।
इस वर्ष फरवरी में आयोजित कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रभाव सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों से भारत में ही अपना डेटा रखने का आग्रह किया था। सरकार का लक्ष्य देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ा मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना है।
भारत में डेटा केंद्रों को वर्ष 2022 में बुनियादी ढांचे का दर्जा दिया गया था। इसके बाद केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से डेटा केंद्रों और डिजिटल सेवाओं में निवेश आकर्षित करने के लिए कई नीतियां और प्रोत्साहन योजनाएं लागू की गई हैं।
हालांकि, ठाणे और विशाखापत्तनम में उठ रहे विरोध से यह सवाल भी सामने आया है कि डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विकास के साथ स्थानीय संसाधनों, पर्यावरण और नागरिक सुविधाओं के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।