नई दिल्ली: अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने और जातिगत भेदभाव को कम करने के उद्देश्य से केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों की ओर से आर्थिक प्रोत्साहन योजनाएं चलाई जाती हैं। सोशल मीडिया पर इन दिनों यह दावा तेजी से चर्चा में है कि अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों को सरकार की ओर से 50 हजार रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता मिल सकती है। हालांकि, इस दावे को समझते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान रखना जरूरी है कि 5 लाख रुपये की राशि सभी अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों को केंद्र सरकार की ओर से सीधे नहीं मिलती। सहायता की राशि, पात्रता और आवेदन की प्रक्रिया राज्य तथा लागू योजना के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
अंतरजातीय विवाह पर आर्थिक मदद का क्या है प्रावधान?
केंद्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के तहत अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए व्यवस्था मौजूद है। इसका उद्देश्य ऐसे विवाहों को सामाजिक समरसता और जातिगत भेदभाव कम करने के एक माध्यम के रूप में प्रोत्साहित करना है।
केंद्रीय स्तर पर यह व्यवस्था Protection of Civil Rights Act, 1955 के तहत संचालित Centrally Sponsored Scheme से जुड़ी है। इसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सहायता दी जाती है, जबकि वास्तविक आवेदन और लाभ वितरण की प्रक्रिया संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के सामाजिक कल्याण विभाग के माध्यम से होती है।
इसलिए अगर किसी व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर यह पढ़ा है कि “अंतरजातीय शादी करते ही केंद्र सरकार 5 लाख रुपये देगी”, तो इसे पूरी तरह सही मानना ठीक नहीं होगा।
5 लाख रुपये वाली बात कहां से आई?
अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन की राशि पूरे देश में एक समान नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से पहले जारी जानकारी में भी स्पष्ट किया गया था कि अलग-अलग राज्यों में प्रोत्साहन राशि अलग रही है और यह राशि 10 हजार रुपये से लेकर 5 लाख रुपये तक बताई गई थी।
यानी 5 लाख रुपये अधिकतम सहायता की चर्चा है, न कि देशभर के सभी पात्र जोड़ों के लिए एक समान भुगतान।
आज भी अलग-अलग राज्यों में अपनी-अपनी योजनाएं लागू हैं। उदाहरण के तौर पर दिल्ली सरकार की आधिकारिक जानकारी के अनुसार अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना में पात्र दंपती को 50 हजार रुपये की सहायता का प्रावधान है। वहीं हरियाणा में मुख्यमंत्री सामाजिक समरसता अंतरजातीय विवाह शगुन योजना के तहत पात्र दंपती को 1.01 लाख रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
राजस्थान में भी अंतरजातीय विवाह के लिए अलग योजना संचालित है और राज्य के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की वेबसाइट पर इसके दिशा-निर्देश और ऑनलाइन आवेदन संबंधी जानकारी उपलब्ध है।
किन जोड़ों को मिल सकता है लाभ?
सामान्य तौर पर अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजनाओं में एक महत्वपूर्ण शर्त यह होती है कि विवाह करने वाले दोनों व्यक्तियों में से एक व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से और दूसरा गैर-SC वर्ग से संबंधित हो।
केंद्र की पुरानी डॉ. आंबेडकर योजना के दिशा-निर्देशों में भी अंतरजातीय विवाह की यही परिभाषा दी गई थी। हालांकि, वर्तमान में आवेदन की प्रक्रिया राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संबंधित योजनाओं के माध्यम से संचालित होती है।
इसके अलावा विवाह का कानूनी रूप से वैध और पंजीकृत होना, पात्रता की अन्य शर्तें पूरी करना और निर्धारित समय के भीतर आवेदन करना जरूरी हो सकता है। इसलिए केवल अलग-अलग जाति में शादी कर लेना अपने आप में सरकारी सहायता मिलने की गारंटी नहीं है।
डॉ. आंबेडकर योजना को लेकर क्या है अपडेट?
डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन की वेबसाइट के अनुसार 1 अप्रैल 2023 से डॉ. आंबेडकर योजना फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटर-कास्ट मैरिजेज को संबंधित केंद्रीय प्रायोजित योजना में मिला दिया गया है। इसके बाद नए अंतरजातीय विवाह मामलों के आवेदन संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के सामाजिक कल्याण विभाग की प्रक्रिया के अनुसार किए जाने हैं।
इसका मतलब यह है कि अब पुराने तरीके से सीधे डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन में नया आवेदन करना सही प्रक्रिया नहीं है। आवेदक को अपने राज्य की वर्तमान व्यवस्था और संबंधित विभाग की जानकारी देखनी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि डॉ. आंबेडकर फाउंडेशन की वेबसाइट पर 2025 और 2026 में अंतरजातीय विवाह योजना से जुड़े लाभार्थियों की सूचियां भी प्रकाशित हुई हैं। मार्च 2026 में फाउंडेशन ने ऐसे लाभार्थियों की सूची जारी की थी जिनके दस्तावेजों से संबंधित प्रक्रिया लंबित थी।
आवेदन करने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
अंतरजातीय विवाह के बाद सरकारी आर्थिक सहायता के लिए आवेदन करने वाले जोड़ों को सबसे पहले अपने राज्य की आधिकारिक वेबसाइट पर योजना की वर्तमान शर्तें देखनी चाहिए।
आमतौर पर आवेदन के दौरान विवाह प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र, पहचान पत्र, बैंक खाते की जानकारी और अन्य आवश्यक दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। कुछ योजनाओं में आय सीमा, पहली शादी, निवास और विवाह पंजीकरण जैसी अतिरिक्त शर्तें भी हो सकती हैं।
पुरानी डॉ. आंबेडकर योजना के दिशा-निर्देशों में विवाह पंजीकरण और निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन जैसी शर्तों का उल्लेख था। वर्तमान आवेदन प्रक्रिया राज्य-विशिष्ट होने के कारण पुरानी शर्तों को बिना जांचे लागू मानना उचित नहीं होगा।
अलग-अलग राज्यों में अलग है सहायता राशि
यही इस पूरी खबर का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। अंतरजातीय विवाह पर मिलने वाली आर्थिक सहायता पूरे भारत में एक समान नहीं है।
उदाहरण के लिए दिल्ली में आधिकारिक योजना के तहत 50 हजार रुपये का प्रावधान है, जबकि हरियाणा में पात्र दंपती को 1.01 लाख रुपये की सहायता दी जाती है। गुजरात की आधिकारिक योजना में 50 हजार रुपये की वित्तीय सहायता का उल्लेख है।
इसलिए किसी वायरल पोस्ट में दिखाई गई “5 लाख रुपये तक की सहायता” को देखकर यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हर राज्य में हर पात्र दंपती को पांच लाख रुपये मिलेंगे।
क्या है इस योजना का उद्देश्य?
सरकार की इन योजनाओं का मूल उद्देश्य केवल आर्थिक मदद देना नहीं है। इनके पीछे सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना और जाति आधारित भेदभाव को कम करना भी प्रमुख उद्देश्य है।
अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिए जाने की व्यवस्था लंबे समय से विभिन्न राज्यों में लागू रही है। केंद्र सरकार राज्यों को इस दिशा में सहायता देती है, जबकि योजना के वास्तविक क्रियान्वयन में राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
अगर आप अंतरजातीय विवाह करने की योजना बना रहे हैं या विवाह हो चुका है, तो 5 लाख रुपये की राशि को निश्चित सरकारी लाभ मानकर न चलें। सबसे पहले यह पता करें कि आपके राज्य में कौन-सी योजना लागू है, उसमें कितनी राशि मिलती है और पात्रता की क्या शर्तें हैं। सरकारी वेबसाइट या संबंधित सामाजिक कल्याण विभाग से सत्यापन करने के बाद ही आवेदन करें।
यानी वायरल दावे का सच यह है कि अंतरजातीय विवाह के लिए सरकारी आर्थिक प्रोत्साहन की व्यवस्था जरूर है, लेकिन राशि राज्य और योजना के अनुसार बदलती है। 5 लाख रुपये पूरे देश के सभी अंतरजातीय विवाह करने वाले जोड़ों के लिए तय राशि नहीं है।