कोच्चि: केरल हाई कोर्ट ने विझिंजम बंदरगाह के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से जुड़े मामले में दो गैर-सरकारी संगठनों (NGO) को बड़ी राहत दी है। अदालत ने केंद्र सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसके तहत दोनों संस्थाओं के विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA पंजीकरण के नवीनीकरण को मंजूरी नहीं दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक अधिकार के तहत शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का समर्थन करना अपने आप में विदेशी धन के दुरुपयोग या किसी अवांछित उद्देश्य के लिए उसके इस्तेमाल के बराबर नहीं माना जा सकता।
अदालत ने अपने 11 अगस्त के आदेश में कहा कि किसी परियोजना के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से असहमति जताना या अपनी शिकायत सामने रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। केवल इस आधार पर किसी विरोध को ‘अवांछित उद्देश्य’ नहीं माना जा सकता कि वह सरकार या प्रशासन की नीतियों के खिलाफ है।
मामले में केंद्र की ओर से दोनों NGO के खिलाफ यह कार्रवाई की गई थी कि उन्होंने विझिंजम समुद्री बंदरगाह के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को कथित तौर पर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। इसके आधार पर उनके FCRA पंजीकरण के नवीनीकरण को रोक दिया गया था।
हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि विरोध प्रदर्शन को आर्थिक सहायता देना स्वतः FCRA के तहत प्रतिबंधित गतिविधि बन जाता है। अदालत ने कहा कि संविधान नागरिकों को अपनी मांगों और असहमति को शांतिपूर्ण तरीके से व्यक्त करने का अधिकार देता है। इसलिए किसी संवैधानिक अधिकार के इस्तेमाल को केवल प्रशासन की असहमति के आधार पर अवांछित गतिविधि नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने FCRA की धारा 12(4)(a)(ii) में इस्तेमाल किए गए ‘अवांछित उद्देश्य’ शब्द की व्याख्या भी की। कोर्ट ने कहा कि इस शब्द का अर्थ केवल ऐसा उद्देश्य नहीं लगाया जा सकता जिसे सरकार या राजनीतिक सत्ता पसंद नहीं करती हो।
अदालत के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति या समूह की मांग सरकार की नीति या किसी विकास परियोजना से अलग है, तो सिर्फ इस राजनीतिक या नीतिगत असहमति के कारण उस गतिविधि को जनहित के खिलाफ नहीं माना जा सकता। इसके लिए कानून के तहत ठोस आधार और परिस्थितियों का होना जरूरी है।
हाई कोर्ट ने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि दोनों NGO की ओर से प्रदर्शनकारियों को कुछ आर्थिक सहायता दी गई थी, तब भी केवल इस तथ्य के आधार पर इसे विदेशी योगदान का गलत इस्तेमाल नहीं कहा जा सकता। अदालत ने माना कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन को समर्थन देना अपने आप में FCRA के प्रावधानों का उल्लंघन साबित नहीं करता।
इस फैसले में अदालत ने विदेशी योगदान के नियमन और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया है। FCRA का उद्देश्य विदेशी धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है, लेकिन कानून का इस्तेमाल वैध लोकतांत्रिक असहमति को रोकने के लिए नहीं किया जा सकता।
केरल हाई कोर्ट का फैसला दोनों NGO के लिए महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है। FCRA पंजीकरण विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों के लिए महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में पंजीकरण का नवीनीकरण रुकने से किसी संस्था की गतिविधियों और विदेशी फंड से जुड़े कार्यों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत के आदेश के बाद अब केंद्र सरकार के संबंधित फैसले का आधार कमजोर हुआ है और दोनों संस्थाओं को कानूनी राहत मिली है। हालांकि, विदेशी योगदान से जुड़े अन्य नियमों और अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं का पालन NGO को करना होगा।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश में FCRA के तहत विदेशी फंड प्राप्त करने वाले NGO की गतिविधियों और सरकारी निगरानी को लेकर व्यापक बहस चल रही है। सरकार का पक्ष रहा है कि विदेशी योगदान के इस्तेमाल में पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित सुनिश्चित करना जरूरी है। दूसरी ओर, नागरिक संगठनों और अधिकार समूहों की ओर से समय-समय पर यह चिंता जताई जाती रही है कि नियामकीय प्रावधानों का इस्तेमाल वैध असहमति को सीमित करने के लिए नहीं होना चाहिए।
विझिंजम मामले में हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक बहस को महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ देती है। अदालत ने साफ किया कि शांतिपूर्ण विरोध और सरकार की नीतियों से असहमति लोकतांत्रिक अधिकारों का हिस्सा है। केवल प्रशासन की नाराजगी या किसी परियोजना का विरोध किए जाने के आधार पर उसे ‘अवांछित उद्देश्य’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
फिलहाल यह फैसला FCRA के तहत सरकारी शक्तियों और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में इस आदेश का असर विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले संगठनों और उनके अधिकारों से जुड़े मामलों में भी दिखाई दे सकता है।