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हाईकोर्ट का फैसला, गहरे संदेह को दोषसिद्धि का आधार नहीं माना जा सकता

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने करीब 42 साल पुराने हत्या के मामले में दो आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया है। अदालत ने संत राम और राम लाल को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल संदेह, आशंका या पुरानी दुश्मनी के […]

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  • August 19, 2026 3:15 pm IST, Published 1 hour ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने करीब 42 साल पुराने हत्या के मामले में दो आरोपियों को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया है। अदालत ने संत राम और राम लाल को दी गई उम्रकैद की सजा को रद्द कर दिया। पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल संदेह, आशंका या पुरानी दुश्मनी के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आपराधिक मामले में दोष साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य जरूरी हैं।

यह मामला शाहजहांपुर जिले के पुवायां थाना क्षेत्र में जनवरी 1984 में हुई रामचंद्र की हत्या से जुड़ा था। घटना के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की और मामला अदालत तक पहुंचा। शाहजहांपुर की विशेष/अपर सत्र अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी मानते हुए 2 अगस्त 1984 को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपियों ने हाई कोर्ट में अपील की थी।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने की। अदालत ने अभियोजन पक्ष की कहानी, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट सहित उपलब्ध साक्ष्यों का विस्तार से परीक्षण किया। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने ऐसे कई तथ्य आए, जिनसे अभियोजन की कहानी पर गंभीर सवाल खड़े हुए।

अभियोजन के मुताबिक, शिकायतकर्ता और कथित प्रत्यक्षदर्शी नत्थू लाल ने बताया था कि आरोपियों ने पहले रामचंद्र पर बंदूक से गोली चलाई। गोली लगने के बाद उसके गिरने की बात कही गई और इसके बाद भाले तथा चाकू से हमला करने का आरोप लगाया गया। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने इस कहानी को पूरी तरह समर्थन नहीं दिया।

मृतक का पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक डॉ. केके श्रीवास्तव की रिपोर्ट में शरीर पर चाकू के 24 घाव पाए गए थे। लेकिन रिपोर्ट में गोली लगने या भाले से चोट पहुंचने के स्पष्ट निशान नहीं मिले। अदालत ने माना कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और चिकित्सकीय साक्ष्य के बीच यह अंतर महत्वपूर्ण है।

पीठ ने घटना के समय की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा। घटना सुबह करीब सात बजे की बताई गई थी। उस समय ठंड के साथ घना कोहरा होने की बात सामने आई। अदालत के अनुसार, घटनास्थल से लगभग 20 से 22 कदम की दूरी पर मौजूद व्यक्ति के लिए ऐसी परिस्थितियों में पूरी घटना को स्पष्ट रूप से देख पाना संदेह पैदा करता है। शिकायतकर्ता के मोतियाबिंद से पीड़ित होने की बात ने भी उसकी गवाही की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए।

हाई कोर्ट ने कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था में संदेह का लाभ आरोपी को मिलता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी घटना के पीछे संभावित दुश्मनी होना अपने आप में अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पुरानी रंजिश कभी-कभी वास्तविक अपराध का कारण बन सकती है, लेकिन उसी रंजिश का इस्तेमाल किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाने के लिए भी किया जा सकता है।

पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के उस स्थापित सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसके अनुसार संदेह कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह प्रमाण का विकल्प नहीं बन सकता। अभियोजन को अपने आरोपों को विश्वसनीय और ठोस साक्ष्यों से साबित करना होता है।

इन परिस्थितियों में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। इसके बाद अदालत ने दोनों आरोपियों की उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उन्हें मामले में बरी कर दिया। करीब चार दशक पुराने इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला एक बार फिर इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को सामने लाता है कि दोषसिद्धि केवल आशंका या विरोधाभासी गवाही के आधार पर नहीं की जा सकती।

 

 

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