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जाति जनगणना में OBC कैटेगरी पर सवाल, राहुल-खरगे ने मोदी को लिखा पत्र

नई दिल्ली: जाति जनगणना को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए स्पष्ट कैटेगरी क्यों नहीं रखी गई है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जनगणना की प्रश्नावली और […]

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  • August 25, 2026 3:00 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: जाति जनगणना को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार से सवाल किया है कि जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के लिए स्पष्ट कैटेगरी क्यों नहीं रखी गई है। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी और राज्यसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जनगणना की प्रश्नावली और जाति दर्ज करने की प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने की मांग की है। दोनों नेताओं का कहना है कि यदि जातियों का विवरण व्यवस्थित तरीके से दर्ज नहीं किया गया तो देश में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या का सही आकलन करना मुश्किल हो सकता है।

कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, मौजूदा प्रक्रिया में लोगों से उनकी जाति का विवरण पूछा जा रहा है, लेकिन OBC की पहचान के लिए स्पष्ट वर्गीकरण उपलब्ध नहीं है। उनका तर्क है कि केवल व्यक्ति द्वारा बताए गए जाति के नाम को दर्ज कर लेने से देशभर में एक ही जाति के कई अलग-अलग नाम सामने आ सकते हैं। अलग-अलग राज्यों, भाषाओं, क्षेत्रों और स्थानीय परंपराओं के कारण जातियों के नाम बदलने की स्थिति में डेटा काफी बिखर सकता है।

राहुल गांधी और खरगे ने अपने पत्र में जाति की जानकारी जुटाने के लिए ड्रॉपडाउन सूची या पहले से निर्धारित कोड प्रणाली अपनाने का सुझाव दिया है। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की पहचान के लिए जिस तरह निर्धारित सूची और कोड का इस्तेमाल किया जाता है, उसी तरह OBC तथा अन्य सामाजिक समूहों के लिए भी स्पष्ट सूची तैयार की जानी चाहिए।

कांग्रेस नेताओं का दावा है कि यदि जनगणना में खुला विकल्प रखा गया और व्यक्ति अपनी जाति का नाम अपने तरीके से दर्ज कराता है, तो एक ही सामाजिक समूह कई नामों में दर्ज हो सकता है। इससे अंतिम आंकड़ों को व्यवस्थित करने में कठिनाई पैदा होगी। उनका कहना है कि जाति जनगणना का उद्देश्य केवल जातियों की संख्या गिनना नहीं, बल्कि देश की सामाजिक संरचना की वास्तविक स्थिति सामने लाना भी है। ऐसे में डेटा संग्रह की प्रक्रिया स्पष्ट और वैज्ञानिक होना जरूरी है।

पत्र में यह भी कहा गया है कि सही जातीय आंकड़े सामाजिक न्याय से जुड़ी नीतियों के लिए महत्वपूर्ण होंगे। शिक्षा, रोजगार, सरकारी योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों में अलग-अलग सामाजिक वर्गों की स्थिति का आकलन करने के लिए विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत होती है। यदि OBC और अन्य पिछड़े समूहों की संख्या सही तरीके से दर्ज नहीं होगी तो नीतियां तैयार करने में भी कठिनाई आ सकती है।

राहुल गांधी और खरगे ने जातियों की पहचान के लिए सरकारी सूचियों का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया है। इसमें सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग से संबंधित उपलब्ध सूचियों के साथ भारतीय मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण जैसी संस्थाओं से प्राप्त जानकारी का उपयोग किया जा सकता है। उनका कहना है कि विभिन्न राज्यों में पहले किए गए जातीय सर्वेक्षणों से भी इस प्रक्रिया के लिए उपयोगी मॉडल लिया जा सकता है।

कांग्रेस नेताओं ने तेलंगाना और बिहार के उदाहरण का भी उल्लेख किया है। तेलंगाना में जातीय सर्वेक्षण के दौरान अलग-अलग सामाजिक वर्गों और जातियों के लिए कोड तथा वर्गीकरण की व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया था। इसी तरह बिहार में जातीय सर्वेक्षण के दौरान जातियों को निर्धारित कोड दिए गए थे। कांग्रेस का कहना है कि ऐसे अनुभवों का अध्ययन कर राष्ट्रीय स्तर पर अधिक व्यवस्थित व्यवस्था बनाई जा सकती है।

बिहार में जातीय सर्वेक्षण के दौरान बड़ी संख्या में जातियों को अलग-अलग कोड दिए गए थे। इसका उद्देश्य अलग-अलग नामों और स्थानीय पहचान के बावजूद एक समान डेटाबेस तैयार करना था। इसी तरह तेलंगाना में भी जातियों को वर्गीकृत करके डेटा एकत्र करने का प्रयास किया गया। कांग्रेस का कहना है कि इन राज्यों के अनुभवों से राष्ट्रीय जनगणना के लिए बेहतर प्रणाली तैयार की जा सकती है।विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री से मौजूदा प्रश्नावली की समीक्षा करने की मांग की है।

नई प्रश्नावली तैयार करने से पहले सभी राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, जनगणना विशेषज्ञों और संबंधित समुदायों से चर्चा की जाए। उनका मानना है कि व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई प्रश्नावली अधिक व्यावहारिक और पारदर्शी होगी। जाति जनगणना को लेकर राजनीतिक बहस पहले से जारी है। कांग्रेस लंबे समय से जातीय आंकड़ों को सार्वजनिक करने और पिछड़े वर्गों की वास्तविक संख्या के आधार पर नीतियां तैयार करने की मांग करती रही है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार की जनगणना प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दल अपने सुझाव और आपत्तियां सामने रखते रहे हैं।इस विवाद का मुख्य मुद्दा अब केवल जाति की गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी केंद्रित हो गया है कि जातियों की पहचान और वर्गीकरण किस तरीके से किया जाए। यदि नामों के अलग-अलग रूपों को एक समान श्रेणी में नहीं जोड़ा गया तो आंकड़ों की व्याख्या कठिन हो सकती है।

वहीं, स्पष्ट सूची और कोड प्रणाली अपनाने पर डेटा को अधिक व्यवस्थित तरीके से तैयार करने की संभावना बढ़ सकती है।राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री से इस विषय पर जल्द विचार करने और सभी पक्षों से चर्चा कर प्रक्रिया में आवश्यक बदलाव करने का आग्रह किया है। अब इस मुद्दे पर सरकार की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी। आने वाले समय में यह साफ होगा कि जनगणना की प्रश्नावली में OBC और अन्य सामाजिक समूहों की पहचान के लिए किस तरह की व्यवस्था अपनाई जाती है और जातीय आंकड़ों को किस तरीके से वर्गीकृत किया जाता है।

 

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