नई दिल्ली: यौन अपराध के मामले में दोषी ठहराए गए तहलका के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली है। अदालत ने उनकी सरेंडर से छूट की मांग को स्वीकार नहीं किया और उन्हें दो सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। साथ ही सरेंडर का प्रमाणपत्र जमा करने को कहा गया है। मामले में तेजपाल की अपील पर 22 सितंबर को सुनवाई होगी।
यह मामला वर्ष 2013 में सामने आया था। तेजपाल पर अपनी एक जूनियर महिला सहयोगी के साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगा था। मामले में निचली अदालत ने उन्हें वर्ष 2021 में बरी कर दिया था, लेकिन बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए उन्हें दोषी ठहराया और 10 साल की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने सजा के खिलाफ आगे अपील करने के लिए तेजपाल को सरेंडर करने से पहले चार सप्ताह का समय दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में तेजपाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि घटना को करीब 13 साल बीत चुके हैं और इस दौरान तेजपाल लगभग छह महीने को छोड़कर लगातार जमानत पर रहे हैं। सिब्बल ने अदालत को बताया कि जमानत की अवधि में उनके खिलाफ किसी तरह के दुराचार या शर्तों के उल्लंघन की शिकायत सामने नहीं आई है।
तेजपाल के वकील ने उनकी उम्र और पारिवारिक परिस्थितियों का भी हवाला दिया। उनका कहना था कि तेजपाल अब वरिष्ठ नागरिक हैं और उनका परिवार तथा दो बेटियां हैं। बचाव पक्ष ने यह तर्क भी रखा कि हाईकोर्ट ने सजा सुनाते समय उस पर अंतरिम रोक लगा दी थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में मुख्य अपील लंबित रहने तक उन्हें दोबारा जेल भेजने की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए।
कपिल सिब्बल ने अदालत से कहा कि दोनों पक्ष काफी समय पहले अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं। उनके मुताबिक, मौजूदा चरण में मामले के गुण-दोष पर विस्तृत बहस करने के बजाय केवल यह तय किया जाना चाहिए कि तेजपाल को आत्मसमर्पण से छूट दी जा सकती है या नहीं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि मुख्य अपील पर सीधे सुनवाई की जाए।
हालांकि, गोवा पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस मांग का विरोध किया। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की ओर से सजा पर अंतरिम रोक लगाने का उद्देश्य तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का अवसर देना था। इसका मतलब यह नहीं था कि सुप्रीम कोर्ट से अलग से राहत लिए बिना वह सरेंडर किए बगैर अपनी अपील पर सुनवाई की मांग कर सकते हैं।
तुषार मेहता ने यह भी दलील दी कि यदि तेजपाल को आत्मसमर्पण से छूट चाहिए थी तो उन्हें इसके लिए उचित आवेदन दाखिल करना चाहिए था। उन्होंने सजा की अवधि और अपराध की गंभीरता का उल्लेख करते हुए कहा कि करीब 10 साल की सजा पाए दोषी को केवल अपील लंबित होने के आधार पर आत्मसमर्पण से छूट नहीं दी जानी चाहिए।दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज तथ्यों पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि मामले में अपराध की प्रकृति और दी गई सजा की अवधि महत्वपूर्ण पहलू हैं। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए पीठ ने तेजपाल की सरेंडर से छूट की मांग स्वीकार नहीं की।अदालत ने निर्देश दिया कि तरुण तेजपाल दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करें और इसके बाद सरेंडर से संबंधित प्रमाणपत्र अदालत में जमा किया जाए। साथ ही उनकी मुख्य अपील पर 22 सितंबर को सुनवाई निर्धारित की गई है। इसका मतलब है कि फिलहाल तेजपाल को हाईकोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा के तहत आत्मसमर्पण की प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि वहां तेजपाल की मुख्य अपील पर आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी। फिलहाल अदालत ने उनकी दोषसिद्धि या सजा के अंतिम परिणाम पर कोई फैसला नहीं दिया है। अगली सुनवाई में अपील के आधार और हाईकोर्ट के फैसले से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार किया जा सकता है।