नई दिल्ली: केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के मुद्दे पर कांग्रेस पर तीखा राजनीतिक हमला बोला है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए अपने बयान में चौहान ने कांग्रेस के उस रुख पर सवाल उठाया, जिसमें पार्टी इस व्यवस्था को असंवैधानिक बता रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को एक बार आत्ममंथन करना चाहिए कि उसकी आपत्ति वास्तव में चुनाव सुधार की व्यवस्था से है या लगातार कमजोर हो रहे उसके राजनीतिक आधार से।
शिवराज सिंह चौहान ने अपने बयान में कांग्रेस के पुराने राजनीतिक दौर का उल्लेख करते हुए कहा कि देश में लंबे समय तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे हैं। उनके मुताबिक, 1951-52 से लेकर 1967 तक लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों में एक साथ मतदान की व्यवस्था रही। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस व्यवस्था को कांग्रेस के शासनकाल में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता था, वही व्यवस्था आज कांग्रेस को असंवैधानिक क्यों नजर आ रही है।
केंद्रीय मंत्री ने कांग्रेस के इस तर्क को राजनीतिक विरोधाभास के रूप में पेश किया। उनका कहना था कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर बहस केवल संवैधानिक प्रावधानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक दलों की नीयत और उनके हितों का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
अपने बयान में चौहान ने कांग्रेस पर उन राज्यों की निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने का भी आरोप लगाया, जहां पार्टी सत्ता में नहीं थी। उन्होंने कहा कि सरकारों को समय से पहले गिराने और अलग-अलग समय पर चुनाव कराने की राजनीतिक प्रक्रिया ने देश को लगातार चुनावी चक्र में पहुंचा दिया। हालांकि, ये चौहान के राजनीतिक आरोप हैं और इस मुद्दे पर कांग्रेस का रुख इससे अलग रहा है।
कांग्रेस कह रही है कि ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ असंवैधानिक है, उनका ज़मीर इसकी इजाज़त नहीं देता।
एक बार आईने के सामने खड़े होकर खुद से सच्चे मन से पूछिए
ज़मीर किस बात की इजाज़त नहीं देता?
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की या लगातार ज़मीन खो रही कांग्रेस को बचाने की?कांग्रेस के शासनकाल…
— Shivraj Singh Chouhan (@ChouhanShivraj) August 26, 2026
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के समर्थकों का तर्क है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से बार-बार होने वाले चुनावों पर खर्च कम किया जा सकता है। इसके अलावा राजनीतिक दलों और प्रशासनिक मशीनरी को लगातार चुनावी तैयारियों में लगाने की जरूरत कम हो सकती है। समर्थकों का यह भी मानना है कि इससे सरकारों को अपनी नीतियों और विकास कार्यक्रमों पर अधिक समय देने का अवसर मिलेगा।
वहीं, इस प्रस्ताव के विरोध में कई राजनीतिक दल यह सवाल उठाते रहे हैं कि अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां और स्थानीय मुद्दे अलग होते हैं। ऐसे में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से क्षेत्रीय मुद्दों को राष्ट्रीय मुद्दों के सामने नुकसान हो सकता है। विपक्ष की ओर से संवैधानिक और व्यावहारिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया जाता रहा है। हालांकि, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ को लागू करना केवल राजनीतिक सहमति का विषय नहीं है। इसके लिए संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों में बदलाव, राज्यों की सहमति तथा चुनावी समय-सारिणी को लेकर कई व्यावहारिक सवालों का समाधान जरूरी होगा। यदि किसी राज्य की विधानसभा समय से पहले भंग हो जाती है या किसी सरकार का बहुमत समाप्त हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में चुनावी चक्र को किस तरह बनाए रखा जाएगा, यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।
‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ आने वाले समय में भी भारतीय राजनीति के प्रमुख मुद्दों में बना रहने की संभावना है। इस व्यवस्था को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तर्क-वितर्क केवल चुनाव की तारीखों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे लोकतंत्र, संघवाद, प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक जवाबदेही जैसे व्यापक प्रश्नों से भी जुड़े हैं। ऐसे में अंतिम निर्णय से पहले इन सभी पहलुओं पर सहमति और विस्तृत विमर्श महत्वपूर्ण होगा।