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AI मॉडल की बढ़ती साइबर क्षमता से अमेरिका में हैकिंग का खतरा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल की बढ़ती साइबर क्षमताओं ने तकनीकी दुनिया के सामने सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौती खड़ी कर दी है। चीन की AI लैब जेडएआई के नए मॉडल जीएलएम-5.3 में साइबर कमजोरियां खोजने और उनका फायदा उठाने की क्षमता में सुधार की जानकारी सामने आई है। इसी बीच अमेरिका की AI कंपनी ओपनएआई […]

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  • August 26, 2026 12:01 pm IST, Published 60 minutes ago

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल की बढ़ती साइबर क्षमताओं ने तकनीकी दुनिया के सामने सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौती खड़ी कर दी है। चीन की AI लैब जेडएआई के नए मॉडल जीएलएम-5.3 में साइबर कमजोरियां खोजने और उनका फायदा उठाने की क्षमता में सुधार की जानकारी सामने आई है। इसी बीच अमेरिका की AI कंपनी ओपनएआई के एक मॉडल ने परीक्षण के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को पार कर इंटरनेट से जुड़े एक सिस्टम तक पहुंच बना ली। इन घटनाओं ने शक्तिशाली AI मॉडल के संभावित साइबर दुरुपयोग को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

ओपनएआई से जुड़ी घटना जुलाई में साइबर क्षमता के परीक्षण के दौरान सामने आई। परीक्षण के लिए AI एजेंट को एक अलग और नियंत्रित वातावरण में रखा गया था। जांच के दौरान पता चला कि मॉडल ने इस सुरक्षा सीमा को पार करते हुए इंटरनेट तक पहुंच हासिल कर ली। इसके बाद उसने एक सॉफ्टवेयर में मौजूद ऐसी सुरक्षा खामी का इस्तेमाल किया, जिसकी पहले जानकारी नहीं थी।

जांच में सामने आया कि मॉडल ने इस अज्ञात कमजोरी का फायदा उठाकर AI प्लेटफॉर्म हगिंग फेस के सिस्टम से जुड़े ढांचे तक पहुंच बनाई। ओपनएआई ने इस घटना को असाधारण बताया है। कंपनी के लिए यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परीक्षण का उद्देश्य ही यह पता लगाना था कि शक्तिशाली AI एजेंट वास्तविक परिस्थितियों में किस तरह की साइबर गतिविधियां कर सकते हैं और उनके लिए किस स्तर की सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक है।

चीनी मॉडल की साइबर क्षमता में सुधार

दूसरी ओर, चीनी AI लैब जेडएआई ने अपने नए मॉडल जीएलएम-5.3 की साइबर क्षमताओं को लेकर जानकारी दी है। कंपनी के मुताबिक, नया मॉडल साइबर कमजोरियों की पहचान करने और उनसे जुड़े परीक्षणों में पिछले मॉडल जीएलएम-5.2 की तुलना में बेहतर प्रदर्शन करता है।

विशेष रूप से कमजोरियों के शोषण यानी एक्सप्लॉयटेशन से जुड़े चरण में मॉडल के प्रदर्शन में सुधार देखा गया है। हालांकि, ऐसे मॉडल के इस्तेमाल को लेकर सुरक्षा जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। जेडएआई के अनुसार, मॉडल के वेट्स को सुरक्षा जांच पूरी होने के बाद सार्वजनिक किए जाने की योजना है। AI मॉडल में साइबर क्षमताओं का विकास अपने आप में केवल खतरे का संकेत नहीं है। ऐसी तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षा शोध, सॉफ्टवेयर की कमजोरियां खोजने और डिजिटल सिस्टम को अधिक सुरक्षित बनाने में भी किया जा सकता है। लेकिन यही क्षमताएं यदि गलत हाथों में पहुंचती हैं तो उनका इस्तेमाल साइबर हमले की तैयारी में भी किया जा सकता है।

तकनीकी विशेषज्ञों की मुख्य चिंता यह है कि यदि अत्यधिक सक्षम साइबर AI मॉडल आसानी से उपलब्ध हो गए, तो साइबर अपराधियों के लिए नेटवर्क, सॉफ्टवेयर और डिजिटल बुनियादी ढांचे की कमजोरियां ढूंढना आसान हो सकता है। इससे ऐसे हमलों की तैयारी का समय और तकनीकी बाधाएं कम हो सकती हैं। हालांकि, अभी तक इन क्षमताओं के बड़े पैमाने पर वास्तविक साइबर हमलों में बदलने के प्रमाण सीमित हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को संभावित जोखिमों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। AI की क्षमताएं तेजी से विकसित हो रही हैं और सुरक्षा व्यवस्था को भी उसी गति से मजबूत करने की आवश्यकता है।

हगिंग फेस से जुड़ी घटना के बाद ओपनएआई ने अपने परीक्षणों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में कदम उठाने की बात कही है। इसमें इंटरनेट से AI सिस्टम का अलगाव, गतिविधियों की लगातार निगरानी और संभावित खतरे का तेजी से पता लगाने जैसी व्यवस्थाओं पर जोर दिया जा रहा है। कंपनी का मानना है कि शक्तिशाली AI मॉडल का परीक्षण सामान्य सॉफ्टवेयर टेस्टिंग से अलग तरीके से करना होगा। ऐसे मॉडल स्वयं समस्याओं की पहचान करने, अलग-अलग रास्ते तलाशने और उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करने में सक्षम हो सकते हैं। इसलिए परीक्षण के दौरान उन्हें दिए गए अधिकार और नेटवर्क तक पहुंच पर कड़े नियंत्रण जरूरी हैं।

AI की साइबर क्षमता बढ़ने के साथ कंपनियों के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ इन तकनीकों का इस्तेमाल डिजिटल सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ इनके दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ रही है। आने वाले समय में AI कंपनियों के लिए मॉडल की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ उसके व्यवहार पर निगरानी, सुरक्षित परीक्षण और जिम्मेदार तरीके से सार्वजनिक उपलब्धता सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा।

 

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