नई दिल्ली: करीब 86 साल पुराने दिल्ली रेस क्लब के लिए जमीन खाली करने का संकट गहरा गया है। पटियाला हाउस अदालत ने क्लब के खिलाफ जारी बेदखली आदेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने माना कि क्लब को अपना पक्ष रखने और जरूरी दस्तावेज पेश करने के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए थे, लेकिन उसने तय समय में इसका इस्तेमाल नहीं किया। अब मामले की मुख्य अपील पर 26 सितंबर को सुनवाई होगी।
जिला एवं सत्र न्यायाधीश पितांबर दत्त ने क्लब की अंतरिम राहत संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि एस्टेट ऑफिसर ने क्लब को जवाब और साक्ष्य प्रस्तुत करने का पर्याप्त अवसर दिया था। अदालत के मुताबिक, केंद्र सरकार की ओर से दाखिल याचिका की प्रति भी क्लब को उपलब्ध कराई गई थी। इसके बावजूद क्लब की ओर से समय पर जवाब दाखिल नहीं किया गया।
क्लब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि एस्टेट ऑफिसर की प्रक्रिया में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ। उनका तर्क था कि क्लब को केंद्र सरकार की याचिका की प्रति नहीं मिली थी, जिससे उसे अपना प्रभावी पक्ष रखने में परेशानी हुई। अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 27 अप्रैल 2026 के आदेश में एस्टेट ऑफिसर ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया था कि संबंधित याचिका की प्रति क्लब को दी जा चुकी थी। इस आदेश पर क्लब के सचिव और उसके कानूनी प्रतिनिधि कर्नल एसके बख्शी के हस्ताक्षर भी मौजूद थे। अदालत ने यह भी कहा कि बाद की किसी सुनवाई में क्लब ने यह शिकायत नहीं की कि उसे याचिका की प्रति नहीं मिली।
मामले की शुरुआत केंद्र सरकार की ओर से जारी बेदखली नोटिस से हुई। पब्लिक प्रिमाइसेज एक्ट की धारा 5 के तहत कार्रवाई शुरू करने से पहले क्लब को 12 मार्च 2026 को नोटिस दिया गया था। इसमें उससे 15 दिन के भीतर परिसर खाली करने और जमीन का शांतिपूर्ण कब्जा लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस को सौंपने को कहा गया था। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया था कि ऐसा नहीं करने पर कानून के तहत बेदखली की कार्रवाई की जाएगी।
क्लब ने इस नोटिस को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। शुरुआती चरण में हाई कोर्ट से उसे अंतरिम राहत मिली थी। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से यह आश्वासन दिया गया कि क्लब को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना बेदखल नहीं किया जाएगा। इसके बाद हाई कोर्ट ने 9 अप्रैल 2026 को क्लब का सिविल मुकदमा निपटा दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने एस्टेट ऑफिसर के समक्ष आगे की कार्रवाई के लिए आवेदन किया। क्लब को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। अदालत के मुताबिक, नोटिस मिलने के बाद भी क्लब ने इस प्रक्रिया का प्रभावी ढंग से विरोध नहीं किया और अपना जवाब दाखिल नहीं किया।
दिल्ली रेस क्लब ने यह तर्क भी दिया कि मामले में दोबारा कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि पहले ही इस मुद्दे पर न्यायिक प्रक्रिया हो चुकी है। इसे कानूनी भाषा में ‘रेस ज्यूडिकाटा’ का सिद्धांत बताया गया। अदालत ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया। क्लब की ओर से एक अन्य महत्वपूर्ण तर्क यह था कि वह नियमित रूप से किराया चुका रहा है, इसलिए उसे अनधिकृत कब्जेदार नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस दलील पर भी राहत देने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि 1994 के बाद केंद्र सरकार की ओर से लीज बढ़ाने या उसके नवीनीकरण से संबंधित कोई दस्तावेज रिकॉर्ड में सामने नहीं आया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लीज की अवधि समाप्त होने के बाद किराया देते रहने से लीज अपने आप नवीनीकृत नहीं हो जाती। ऐसे में दिल्ली रेस क्लब के पास परिसर में बने रहने का स्वतः अधिकार साबित करने के लिए पर्याप्त आधार दिखाई नहीं देता। दिल्ली रेस क्लब लंबे समय से राजधानी के सामाजिक और खेल जीवन का हिस्सा रहा है। ऐसे में उसके परिसर से जुड़ा यह विवाद केवल जमीन और लीज तक सीमित नहीं है, बल्कि पुराने संस्थानों के भूमि अधिकार, सरकारी संपत्तियों के इस्तेमाल और लीज समाप्त होने के बाद कब्जे की कानूनी स्थिति जैसे सवाल भी सामने लाता है।
फिलहाल अदालत के आदेश के बाद क्लब के सामने परिसर खाली करने का दबाव बढ़ गया है। हालांकि, मुख्य अपील पर होने वाली सुनवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण होगी कि बेदखली आदेश के खिलाफ क्लब को आगे कोई कानूनी राहत मिलती है या नहीं।