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UNGA में FIPIC बैठक, जयशंकर ने प्रशांत द्वीप देशों संग सहयोग बढ़ाया

भारत ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रशांत द्वीप देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही। प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और क्षमता निर्माण के जरिए स्थानीय संस्थानों को मजबूत करने पर जोर दिया गया। भारत की ओर से डिजिटल तकनीक और विकास से जुड़े अनुभव साझा करने की

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  • September 24, 2026 11:15 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 23 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान भारत-प्रशांत द्वीप सहयोग मंच (FIPIC) के विदेश मंत्रियों की दूसरी बैठक की अध्यक्षता की। बैठक में प्रशांत द्वीप समूह के कई देशों के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा का मुख्य केंद्र भारत और प्रशांत द्वीप देशों के बीच विकास, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, शिक्षा, नवीकरणीय ऊर्जा और आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाना रहा।

बैठक में समोआ के उपप्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के अलावा फिजी, मार्शल आइलैंड्स, पलाऊ, पापुआ न्यू गिनी, सोलोमन आइलैंड्स और तुवालु के विदेश मंत्री शामिल हुए। टोंगा के वित्त मंत्री, फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेशिया के न्याय विभाग के सचिव एवं अटॉर्नी जनरल, वानुअतु के स्वास्थ्य मंत्री और नौरू के उपविदेश मंत्री ने भी बैठक में हिस्सा लिया। प्रशांत द्वीप समूह फोरम के महासचिव भी इस बैठक में मौजूद रहे।

बैठक के दौरान FIPIC शिखर सम्मेलनों में लिए गए निर्णयों और उनके क्रियान्वयन की समीक्षा की गई। प्रतिनिधियों ने भारत और प्रशांत द्वीप देशों के बीच सहयोग में हुई प्रगति पर चर्चा की। खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से 2023 में घोषित 12 सूत्रीय कार्ययोजना के तहत आगे बढ़े कामों का उल्लेख किया गया। इस कार्ययोजना में स्वास्थ्य, नवीकरणीय ऊर्जा, तकनीक, कनेक्टिविटी और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है।

जयशंकर ने कहा कि प्रशांत द्वीप देशों के साथ भारत की साझेदारी जरूरत आधारित और विकास पर केंद्रित रही है। भारत इन देशों की स्थानीय प्राथमिकताओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर देता है। भारत ने पैसिफिक आइलैंड फोरम की ‘2050 स्ट्रेटेजी फॉर द ब्लू पैसिफिक कॉन्टिनेंट’ में तय प्राथमिकताओं के प्रति अपना समर्थन भी दोहराया।भारत और प्रशांत द्वीप देशों के बीच सहयोग में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियां एक प्रमुख विषय बनी हुई हैं।

प्रशांत क्षेत्र के कई छोटे द्वीपीय देश समुद्र के बढ़ते स्तर, चरम मौसम और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से प्रभावित होते हैं। बैठक में इस क्षेत्र की आपदा से निपटने की क्षमता बढ़ाने और टिकाऊ विकास को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया। चर्चा के दौरान अल नीनो से पैदा होने वाली परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया। प्रशांत द्वीप देशों के लिए मौसम में बदलाव और उससे जुड़े प्रभाव गंभीर चुनौती बन सकते हैं। भारत ने ऐसे प्रभावों से निपटने और आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। आपदा के समय बेहतर तैयारी, बुनियादी ढांचे की मजबूती और स्थानीय क्षमता विकसित करने को सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्र के तौर पर देखा गया।

नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा हुई। भारत ने प्रशांत द्वीप देशों को अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके साथ ही आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे से संबंधित वैश्विक पहल में भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। भारत का कहना है कि सौर ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में तकनीकी और संस्थागत सहयोग छोटे द्वीपीय देशों के लिए उपयोगी हो सकता है।

बैठक में अंतरिक्ष और समुद्री क्षेत्र से जुड़े सहयोग पर भी ध्यान दिया गया। टिकाऊ तटीय विकास और समुद्री अनुसंधान के क्षेत्र में संयुक्त प्रयासों की संभावनाओं पर विचार किया गया। प्रशांत क्षेत्र में समुद्री संसाधनों और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्व देखते हुए इन क्षेत्रों में तकनीक, शोध और क्षमता निर्माण को सहयोग का हिस्सा बनाने पर चर्चा हुई।

भारत ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी प्रशांत द्वीप देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की बात कही। प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और क्षमता निर्माण के जरिए स्थानीय संस्थानों को मजबूत करने पर जोर दिया गया। भारत की ओर से डिजिटल तकनीक और विकास से जुड़े अनुभव साझा करने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।

बैठक के अंत में भारत और प्रशांत द्वीप देशों ने क्षेत्रीय तथा बहुपक्षीय मंचों पर आपसी समन्वय और सहयोग मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। FIPIC के माध्यम से दोनों पक्षों के बीच नियमित संवाद और विकास संबंधी साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। बैठक को भारत और प्रशांत द्वीप देशों के बीच विकास सहयोग, जलवायु कार्रवाई और साझा प्राथमिकताओं पर संवाद को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा गया।

 

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