नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस के नाम और पारंपरिक चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले को चुनौती देते हुए दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने आयोग से इस विवाद पर अंतिम निर्णय लेने में लगने वाले समय की जानकारी मांगी। अदालत ने चुनाव आयोग से निर्देश लेकर सोमवार, 28 सितंबर को समय-सीमा बताने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई भी सोमवार को होगी।
चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर दो गुटों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद के बीच ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और पारंपरिक ‘फूल-घास’ चुनाव चिन्ह को फिलहाल फ्रीज कर दिया है। आयोग ने इसे अंतरिम व्यवस्था बताते हुए आगामी उपचुनावों के लिए दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए हैं। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘फुटबॉल प्लेयर’ चुनाव चिन्ह दिया गया है, जबकि दूसरे गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चिन्ह आवंटित किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मामले को तत्काल महत्व देने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिन्ह फ्रीज किए जाने से उनके पक्ष के सामने गंभीर समस्या पैदा हुई है। सिब्बल ने अदालत से उचित राहत देने का आग्रह करते हुए इसे पार्टी के अस्तित्व से जुड़ा विषय बताया।
सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि इस विवाद का समाधान चुनाव आयोग के स्तर पर जल्द अंतिम निर्णय से जुड़ा है। अदालत ने आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू से आयोग से निर्देश लेने को कहा कि पूरे विवाद के निपटारे में कितना समय लग सकता है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी संबंधित पक्षों को अपनी बात रखने और दस्तावेज व साक्ष्य पेश करने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
दूसरे गुट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने भी अदालत के सामने अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह विवाद विस्तृत सुनवाई की मांग करता है और संबंधित पक्षों को दस्तावेज तथा अन्य सबूत दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय की जरूरत होगी। उनका कहना था कि आयोग के सामने मामले की प्रक्रिया को केवल कुछ दिनों या सीमित अवधि में पूरा करना व्यावहारिक नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि चुनाव आयोग को मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, विवाद में शामिल सभी पक्षों को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिलना जरूरी है। अदालत ने फिलहाल चुनाव आयोग के अंतरिम फैसले को लेकर अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय आयोग से अंतिम निर्णय की संभावित समय-सीमा बताने को कहा है।
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल में उपचुनाव होने वाले हैं। आयोग की अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव मैदान में उतरना होगा। ममता बनर्जी के गुट की ओर से अदालत में यह चिंता जताई गई कि यदि मूल नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर आयोग का अंतिम फैसला जल्द नहीं आता, तो आगे होने वाले चुनावों पर इसका असर पड़ सकता है। खास तौर पर नवंबर में प्रस्तावित निगम चुनावों का भी हवाला दिया गया।
चुनाव आयोग ने फिलहाल मूल पार्टी पहचान पर अंतिम फैसला सुरक्षित रखते हुए दोनों गुटों को अस्थायी तौर पर अलग पहचान दी है। आयोग का अंतिम निर्णय इस बात को तय करेगा कि मूल नाम और चुनाव चिन्ह पर दोनों पक्षों के दावों में किसे मान्यता दी जाती है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने आयोग से प्रक्रिया पूरी करने में लगने वाले समय की स्पष्ट जानकारी मांगी है और मामले को 28 सितंबर को फिर सुनवाई के लिए रखा है।