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नाबालिगों के सोशल मीडिया अकाउंट पर सुप्रीम कोर्ट ने नियम बने

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ बच्चों की डिजिटल दुनिया में मौजूदगी भी तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही ऑनलाइन ठगी, साइबर बुलिंग, अनुचित सामग्री, व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग और बच्चों के शोषण से जुड़े जोखिम भी चिंता का विषय बने हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी

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  • September 28, 2026 4:55 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिगों की सोशल मीडिया तक पहुंच और उनकी ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार से नियम बनाने की संभावना पर गंभीरता से विचार करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने संकेत दिया कि बच्चों को सोशल मीडिया अकाउंट बनाने से रोकने के लिए केवल प्रशासनिक दिशा-निर्देश पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि इस व्यवस्था को मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत वैधानिक आधार देने की संभावना पर भी विचार किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 28 सितंबर 2026 की सूची में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची समेत संबंधित पीठ की मौजूदगी दर्ज है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान केवल दिशा-निर्देशों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। पीठ ने केंद्र से कहा कि वह इंटरमीडियरी नियमों के तहत इस संबंध में वैधानिक व्यवस्था बनाने की संभावना की जांच करे। अदालत के सामने विचार का प्रमुख मुद्दा यह रहा कि बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्वतंत्र रूप से अकाउंट बनाने और इन प्लेटफॉर्म के साथ कानूनी संबंध स्थापित करने से किस तरह सुरक्षित रखा जा सकता है।

पीठ ने 18 वर्ष की न्यूनतम आयु से जुड़े प्रावधान की संभावना पर भी विचार करने को कहा। इसका उद्देश्य नाबालिगों की सोशल मीडिया तक पहुंच को लेकर एक स्पष्ट और लागू करने योग्य व्यवस्था तैयार करना है। अदालत की टिप्पणी ऐसे समय आई है जब बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल, ऑनलाइन उत्पीड़न, निजी जानकारी की सुरक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर लगातार चिंताएं सामने आती रही हैं।

सुनवाई के दौरान जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन अलायंस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एचएस फूलका ने दलील दी कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत नाबालिगों द्वारा किए गए कई तरह के अनुबंधों की वैधता पर पहले से सवाल मौजूद हैं। उन्होंने सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के लिए मध्यस्थ कंपनियों पर स्पष्ट और लागू किए जा सकने वाले कानूनी दायित्व तय करने की मांग की।

फूलका ने अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी उठाया कि नाबालिगों को सोशल मीडिया कंपनियों के साथ स्वतंत्र रूप से अनुबंध करने से रोकने के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था जरूरी है। उनके मुताबिक केवल प्लेटफॉर्म की अपनी नीतियों या सामान्य दिशा-निर्देशों के भरोसे बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए कंपनियों की जिम्मेदारियां और नियमों के उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही स्पष्ट होनी चाहिए।

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार इस पूरे मुद्दे की जांच करेगी और जरूरत के मुताबिक आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। केंद्र के रुख के बाद अदालत ने वैधानिक प्रावधान की संभावना पर विचार करने की दिशा में संकेत दिए।

दरअसल, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के विस्तार के साथ बच्चों की डिजिटल दुनिया में मौजूदगी भी तेजी से बढ़ी है। इसके साथ ही ऑनलाइन ठगी, साइबर बुलिंग, अनुचित सामग्री, व्यक्तिगत जानकारी के दुरुपयोग और बच्चों के शोषण से जुड़े जोखिम भी चिंता का विषय बने हैं। सुप्रीम कोर्ट पहले भी बाल यौन शोषण से जुड़ी ऑनलाइन सामग्री के मामले में सोशल मीडिया मध्यस्थों की जिम्मेदारी पर स्पष्ट टिप्पणियां कर चुका है और कहा है कि कानून के तहत निर्धारित दायित्वों का पालन जरूरी है।

अब सोशल मीडिया अकाउंट बनाने की न्यूनतम उम्र को लेकर संभावित नियम इस बहस को एक नए चरण में ले जा सकते हैं। यदि केंद्र सरकार इंटरमीडियरी नियमों के तहत कोई व्यवस्था तैयार करती है तो प्लेटफॉर्म कंपनियों के लिए आयु सत्यापन, अभिभावकीय सहमति और नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े दायित्वों को स्पष्ट किया जा सकता है। हालांकि इन व्यवस्थाओं में बच्चों की निजता, डेटा सुरक्षा और डिजिटल सेवाओं तक उनकी वैध पहुंच के बीच संतुलन बनाना भी महत्वपूर्ण होगा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी फिलहाल किसी अंतिम नियम या 18 वर्ष की आयु सीमा को लागू करने का आदेश नहीं है। अदालत ने केंद्र से इस दिशा में संभावनाओं की जांच करने को कहा है। आगे सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम और अदालत में होने वाली अगली सुनवाई इस मामले की दिशा तय कर सकती है।

 

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