नई दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच कहा है कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके की जीत और डीएमके की हार को केवल मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जोड़ना सही नहीं होगा। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में गड़बड़ियां और गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतें गंभीर विषय हैं, लेकिन इन आधारों पर पूरे चुनाव परिणाम को प्रभावित मान लेना तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा। चिदंबरम ने यह टिप्पणी तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में प्रदर्शन के दौरान मीडिया से बातचीत में की।
चिदंबरम ने SIR की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठाए। उनके मुताबिक अलग-अलग चरणों में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि पहले चरण में करीब 65 लाख, दूसरे चरण में 6.50 करोड़ और तीसरे चरण में 6.10 करोड़ नाम हटाए गए, यानी कुल संख्या लगभग 13.30 करोड़ तक पहुंचती है। उनका सवाल था कि इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने की प्रक्रिया किस आधार पर हुई और प्रभावित लोगों को इसकी जानकारी किस तरह मिली। हालांकि, ये आंकड़े चिदंबरम के दावे के रूप में ही सामने आए हैं और इनके व्यापक संदर्भ में अंतिम आधिकारिक आंकड़ों को अलग से देखना जरूरी है।
कांग्रेस नेता ने पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए नामों के संबंध में अपील प्रक्रिया का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि करीब 22 लाख लोगों ने अपने नाम हटाए जाने के खिलाफ अपील की है। उनके अनुसार छह महीने की अवधि में लगभग 1.26 लाख अपीलों का निस्तारण हुआ और इनमें करीब 91 प्रतिशत मामलों में लोगों के नाम दोबारा शामिल किए गए। चिदंबरम ने इस स्थिति को मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया में गंभीर खामी बताते हुए सवाल किया कि यदि इसी गति से अपीलों का निपटारा होता रहा तो सभी मामलों के निस्तारण में लंबा समय लग सकता है।
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से नाम हटने का सीधा असर नागरिकों के मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है। उनके मुताबिक यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची में नहीं रहता और समय पर उसकी शिकायत का समाधान नहीं होता, तो वह चुनाव में मतदान से वंचित हो सकता है। इसी संदर्भ में उन्होंने चुनाव आयोग की प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए।
हालांकि तमिलनाडु के चुनाव परिणाम को लेकर चिदंबरम ने अपेक्षाकृत अलग रुख रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कहना उचित नहीं होगा कि टीवीके की जीत या डीएमके की हार सिर्फ वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ी या नाम हटाए जाने के कारण हुई। उनके मुताबिक यदि किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसे वापस जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन चुनाव परिणाम पर इसका कितना प्रभाव पड़ा, इसे साबित करने के लिए ठोस आंकड़ों और प्रमाण की आवश्यकता होगी। उन्होंने यह भी कहा कि टीवीके को चुनाव में लगभग 35 प्रतिशत वोट मिले थे और इसलिए केवल SIR को चुनाव परिणाम का आधार मानना सही नहीं होगा।
चिदंबरम ने महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक समेत अन्य राज्यों में भी मतदाता सूची से जुड़े मामलों का उल्लेख किया। उन्होंने दिल्ली में भी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का दावा किया और कहा कि इससे प्रभावित मतदाताओं के अधिकारों पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कुछ चर्चित नामों के मतदाता सूची से हटने का भी उल्लेख किया, हालांकि ऐसे व्यक्तिगत उदाहरणों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। चुनाव आयोग की संरचना और निर्णय प्रक्रिया को लेकर चल रही बहस का भी चिदंबरम ने जिक्र किया।
हाल में दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर आपत्ति किए जाने की खबरों के बाद आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर राजनीतिक बहस तेज हुई है। वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग के भीतर विचार-विमर्श और मतभेद संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं। इस विवाद से संबंधित एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के लिए सहमति जताई है।
चिदंबरम ने प्रदर्शन के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी दोहराई। हालांकि उनके बयानों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि उन्होंने तमिलनाडु के चुनाव परिणाम को केवल मतदाता सूची विवाद के आधार पर खारिज करने की बात नहीं कही। इससे SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस में मतदाता सूची की शुद्धता और चुनाव परिणामों के बीच अंतर को लेकर उनका रुख सामने आया है।