रेपो रेट वह दर है, जिस पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को पैसा उपलब्ध कराता है। जब इस दर में बढ़ोतरी होती है तो बैंकों के लिए फंड की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज पर पड़ सकता है। ऐसे में फ्लोटिंग रेट वाले लोन लेने वाले ग्राहकों की ईएमआई बढ़ने या लोन की अवधि लंबी होने की संभावना रहती है।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर मिडिल क्लास परिवारों के बजट पर पड़ सकता है। पहले से महंगाई, रोजमर्रा के खर्च और घर के बढ़ते बजट से जूझ रहे परिवारों के लिए कर्ज महंगा होना अतिरिक्त दबाव पैदा कर सकता है। खासकर ऐसे परिवार, जिन्होंने घर खरीदने के लिए बड़ा होम लोन लिया है, उनके लिए ब्याज दर में छोटी बढ़ोतरी भी लंबे समय में बड़ा वित्तीय असर डाल सकती है।
रिजर्व बैंक की रणनीति में महंगाई को नियंत्रित करना अहम वजह मानी जा रही है। वैश्विक परिस्थितियों और युद्ध जैसे घटनाक्रमों के कारण कई क्षेत्रों में कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। महंगाई को नियंत्रित करने के लिए केंद्रीय बैंक ब्याज दरों का इस्तेमाल करता है। ब्याज दर बढ़ने से कर्ज महंगा होता है और लोगों तथा कंपनियों की उधार लेकर खर्च करने की क्षमता पर असर पड़ता है।
इसका असर केवल व्यक्तिगत कर्ज तक सीमित नहीं रहता। महंगे लोन के कारण घरों में नई कार, मकान या दूसरे बड़े सामान की खरीद का फैसला टल सकता है। कंपनियां भी नई परियोजनाओं और विस्तार के लिए कर्ज लेने से बच सकती हैं। यानी ब्याज दर बढ़ाने का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में मांग को नियंत्रित करना और कीमतों पर दबाव कम करना होता है।
हालांकि इस नीति का दूसरा पहलू भी है। अगर ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो मांग में कमी आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है। रोजगार, निवेश और आय की रफ्तार पर भी इसका असर पड़ सकता है। ऐसे में महंगाई को काबू करने और आर्थिक विकास को बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना रिजर्व बैंक के सामने बड़ी चुनौती होगी।
रिजर्व बैंक की ओर से कैलिब्रेटेड टाइटनिंग यानी चरणबद्ध तरीके से मौद्रिक नीति को सख्त करने का संकेत बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह माना जा सकता है कि ब्याज दरों में बदलाव एकमुश्त बड़े कदम के बजाय परिस्थितियों के आधार पर धीरे-धीरे किया जा सकता है। अगर महंगाई का दबाव बना रहता है तो आने वाले समय में ब्याज दरों में और बदलाव की संभावना पर नजर रहेगी।
इस बीच बचत करने वालों की नजर फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी पर भी रहेगी। आमतौर पर ब्याज दरों में बदलाव का असर जमा दरों पर भी पड़ सकता है, लेकिन बैंकों की ओर से एफडी दरों में बदलाव कब और कितना होगा, यह उनकी फंडिंग जरूरत और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
कुल मिलाकर रेपो रेट में 0.25 फीसदी की बढ़ोतरी का संदेश साफ है। कर्ज लेने वालों के लिए आने वाला दौर आसान नहीं हो सकता। महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन इसका बोझ आखिरकार ईएमआई चुकाने वाले परिवारों के बजट पर महसूस हो सकता है। अब निगाह इस बात पर होगी कि आगे ब्याज दरों का रुख क्या रहता है और एफडी समेत जमा योजनाओं पर इसका कितना फायदा बचत करने वालों को मिलता है।