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महंगाई, पेट्रोल-डीजल और कमजोर रुपये पर CA विकास तिवारी की राय: आम आदमी की जेब पर बढ़ता दबाव

फाइनेंशियल एक्सपर्ट सीए विकास कुमार तिवारी ने बढ़ती महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी को देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के बजट के लिए बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं […]

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  • May 18, 2026 5:50 pm IST, Published 7 hours ago

फाइनेंशियल एक्सपर्ट सीए विकास कुमार तिवारी ने बढ़ती महंगाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों में उछाल और डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी को देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के बजट के लिए बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमतों में वृद्धि से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं और सार्वजनिक सेवाओं की कीमतों पर पड़ता है। वहीं, कमजोर रुपया आयात को महंगा कर देता है, जिससे बाजार में वस्तुओं की कीमतें और जीवन-यापन का खर्च और अधिक बढ़ जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे आर्थिक हालात में संतुलन बनाए रखने के लिए रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीतियां और सरकार के खर्च नियंत्रण के प्रयास बेहद महत्वपूर्ण हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खर्च में कटौती और संसाधनों के बेहतर उपयोग की अपील को भी उन्होंने आर्थिक स्थिरता की दिशा में एक अहम कदम बताया। गौरवशाली भारत के प्रफुल्ल राय से बातचीत में उन्होंने इन आर्थिक मुद्दों के आम जनता और बाजार पर पड़ने वाले प्रभाव को विस्तार से समझाया।

विकास तिवारी  एस यू वी एंड कंपनी के संस्थापक एवं मैनेजिंग पार्टनर हैं। वे वर्ष 2013 से भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट्स संस्थान (ICAI) के सदस्य हैं। उन्हें वित्तीय योजना, एमआईएस रिपोर्टिंग, बजट प्रबंधन और रणनीतिक वित्तीय सलाह के क्षेत्र में व्यापक अनुभव प्राप्त है। उन्होंने कई प्रमुख कॉर्पोरेट संस्थानों को अपनी विशेषज्ञ सेवाएं प्रदान कर व्यवसायिक वित्तीय प्रबंधन को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रश्न 1: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के सरकारी फैसले को आप कैसे देखते हैं? इसका आम आदमी पर कितना असर पड़ेगा?

विकास तिवारी: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, वैश्विक आपूर्ति संकट और तेल कंपनियों पर बढ़ता वित्तीय दबाव है। आर्थिक दृष्टि से यह कदम सरकार के लिए आवश्यक हो सकता है, लेकिन इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ता है।

ईंधन की कीमतें बढ़ने से परिवहन खर्च बढ़ता है, जिसका असर खाने-पीने की वस्तुओं, सब्जियों, दूध, किराना और रोजमर्रा की जरूरतों पर दिखाई देता है। यानी ईंधन महंगा होने से लगभग हर क्षेत्र में महंगाई बढ़ती है।

मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए ₹2 से ₹5 प्रति लीटर की वृद्धि भी मासिक बजट को प्रभावित करती है। निजी वाहन चलाने वालों का खर्च बढ़ता है, जबकि सार्वजनिक परिवहन का किराया भी महंगा हो सकता है। किसानों पर इसका असर अधिक पड़ता है क्योंकि सिंचाई, ट्रैक्टर और माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है।

यदि सरकार टैक्स में राहत, सब्सिडी या अन्य सहायता देती है तो असर कुछ कम हो सकता है। हालांकि अल्पकाल में लोगों की गैर-जरूरी खर्च करने की क्षमता घट सकती है।

प्रश्न 2: अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई (CPI) और थोक महंगाई (WPI) दोनों बढ़ी हैं। इसका आम जनता और बाजार पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जब खुदरा और थोक दोनों स्तरों पर महंगाई बढ़ती है तो यह अर्थव्यवस्था में व्यापक मूल्य दबाव का संकेत होता है। थोक महंगाई ज्यादा बढ़ने का मतलब है कि कंपनियों की लागत बढ़ रही है, जिसका बोझ आने वाले समय में उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा।

आम लोगों के लिए इसका सबसे बड़ा असर खाद्य पदार्थ, बिजली, ईंधन, दवाइयों और परिवहन जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में दिखाई देता है। जब घरेलू बजट पर दबाव बढ़ता है तो लोग मनोरंजन, यात्रा, इलेक्ट्रॉनिक्स और लग्जरी वस्तुओं पर खर्च कम कर देते हैं।

बाजार के नजरिए से बढ़ती महंगाई कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करती है। विशेषकर मैन्युफैक्चरिंग, लॉजिस्टिक्स और FMCG सेक्टर पर इसका असर अधिक होता है। निवेशकों को भी चिंता रहती है कि भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें बढ़ा सकता है, जिससे लोन महंगे हो जाएंगे।

हालांकि ऊर्जा, कमोडिटी और कच्चे माल से जुड़े सेक्टरों को अल्पकालिक लाभ मिल सकता है। सरकार और RBI के लिए सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित करते हुए आर्थिक विकास को बनाए रखना होगी।

प्रश्न 3: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोना खरीदने, ईंधन की खपत कम करने और विदेश यात्रा टालने की अपील से क्या रुपये को मजबूती मिल सकती है?

यदि लोग बड़े स्तर पर इस तरह की बचत और संयम की नीति अपनाते हैं तो इसका सकारात्मक असर भारतीय रुपये पर पड़ सकता है।

भारत कच्चे तेल और सोने का बड़ा आयातक है। इन दोनों पर देश का भारी विदेशी मुद्रा खर्च होता है। यदि ईंधन की खपत कम होती है और सोने की खरीद घटती है तो डॉलर की मांग कम होगी और चालू खाता घाटा (CAD) नियंत्रित हो सकता है।

वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा मिलने से ईंधन की खपत घट सकती है। वहीं विदेश यात्रा कम होने से विदेशी मुद्रा देश के भीतर बनी रहेगी। इससे रुपये पर दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।

हालांकि केवल अपील के जरिए लंबे समय तक रुपये को स्थिर रखना संभव नहीं है। इसके लिए निर्यात बढ़ाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, महंगाई नियंत्रित रखना और मजबूत आर्थिक सुधार जरूरी हैं। इसलिए यह कदम अल्पकालिक राहत तो दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 4: यदि रुपया लगातार डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है तो इसका आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा? सरकार क्या कदम उठा सकती है?

रुपये की लगातार कमजोरी का असर सीधे आम लोगों और व्यवसायों दोनों पर पड़ता है। भारत कई जरूरी वस्तुओं जैसे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, खाद्य तेल और दवाइयों के आयात पर निर्भर है। रुपया कमजोर होने से ये सभी चीजें महंगी हो जाती हैं। सबसे बड़ा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ता है क्योंकि तेल का भुगतान डॉलर में किया जाता है। इससे परिवहन, बिजली उत्पादन और खाद्य आपूर्ति की लागत बढ़ जाती है।

इसके अलावा मोबाइल, लैपटॉप, विदेशी शिक्षा और विदेश यात्रा भी महंगी हो जाती है। जिन कंपनियों ने विदेशी मुद्रा में कर्ज लिया है, उनकी लागत बढ़ जाती है। हालांकि आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल और निर्यात आधारित उद्योगों को फायदा हो सकता है क्योंकि उनके उत्पाद वैश्विक बाजार में सस्ते पड़ते हैं। रुपये को स्थिर करने के लिए सरकार और RBI निम्न कदम उठा सकते हैं…

  •  विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर बाजार में हस्तक्षेप करना
  • 
रेपो रेट बढ़ाकर विदेशी निवेश आकर्षित करना
  • 
गैर-जरूरी आयात पर नियंत्रण लगाना
  • 
निर्यात को बढ़ावा देना

  • विदेशी निवेश के लिए अनुकूल माहौल बनाना
  • नवीकरणीय ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना

  • वित्तीय घाटे को नियंत्रित रखना
  • लंबे समय में रुपये की मजबूती मजबूत अर्थव्यवस्था, नियंत्रित महंगाई और निवेशकों के विश्वास पर निर्भर करती है।

प्रश्न 5: क्या RBI को जून MPC बैठक में रेपो रेट बढ़ाना चाहिए या यथावत रखना चाहिए?

भारतीय रिजर्व बैंक के सामने फिलहाल महंगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। रेपो रेट बढ़ाने के पक्ष में तर्क यह है कि बढ़ती थोक महंगाई आने वाले समय में खुदरा महंगाई को और बढ़ा सकती है। ब्याज दर बढ़ने से बाजार में नकदी कम होगी और महंगाई पर नियंत्रण पाने में मदद मिलेगी। इससे रुपये को भी मजबूती मिल सकती है।

दूसरी ओर, यदि महंगाई का मुख्य कारण वैश्विक तेल कीमतें और सप्लाई से जुड़ी समस्याएं हैं, तो केवल ब्याज दर बढ़ाने से बहुत ज्यादा फायदा नहीं होगा। इससे होम लोन और बिजनेस लोन महंगे हो जाएंगे, जिससे निवेश और उपभोग दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

ऐसी स्थिति में RBI को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यदि महंगाई लगातार बढ़ती दिखे तो 25 बेसिस पॉइंट की सीमित बढ़ोतरी उचित हो सकती है। लेकिन यदि महंगाई अस्थायी मानी जाती है तो फिलहाल रेपो रेट स्थिर रखते हुए अन्य मौद्रिक उपाय अपनाए जा सकते हैं।

अंततः RBI महंगाई, रुपये की स्थिति, आर्थिक विकास और बाजार के विश्वास को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेगा। साथ ही उसकी स्पष्ट नीति और संवाद भी बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

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