नई दिल्ली। त्योहारों का मौसम नजदीक आते ही रोजमर्रा के इस्तेमाल वाले सामान की कीमतों और पैकेजिंग को लेकर उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ने लगी है। बाजार में महंगाई का असर केवल उत्पादों की कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कई उपभोक्ता पैकेट के आकार और उसमें मिलने वाली मात्रा में बदलाव को भी महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में दावा किया गया है कि कंपनियां छोटे पैकेट में सामान की मात्रा घटाकर कीमत को अपेक्षाकृत कम दिखाने की कोशिश कर रही हैं, जबकि बड़े पैक की कीमतों में भी बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
इस तरह की स्थिति को अर्थव्यवस्था में ‘श्रिंकफ्लेशन’ (Shrinkflation) के तौर पर जाना जाता है। इसमें किसी उत्पाद की पैकेजिंग और कीमत लगभग पहले जैसी दिखाई दे सकती है, लेकिन पैकेट के अंदर मौजूद सामान की मात्रा कम कर दी जाती है। इसका सीधा असर ग्राहक की जेब पर पड़ता है, क्योंकि उपभोक्ता को पहले की तुलना में समान या अधिक कीमत चुकाकर कम उत्पाद मिलता है।
कीमत स्थिर दिखे, लेकिन मात्रा हो सकती है कम
महंगाई के दौर में कंपनियों के सामने कच्चे माल, पैकेजिंग, परिवहन, ऊर्जा और उत्पादन लागत बढ़ने जैसी चुनौतियां रहती हैं। ऐसे में हर उत्पाद की कीमत सीधे बढ़ाने के बजाय कुछ कंपनियां पैकेट का आकार या उसमें मौजूद मात्रा कम करने का विकल्प अपना सकती हैं।
उदाहरण के तौर पर यदि कोई उत्पाद पहले 100 ग्राम के पैकेट में मिलता था और उसकी कीमत 20 रुपये थी, तो कीमत बढ़ाने के बजाय उसे 95 या 90 ग्राम के पैक में उपलब्ध कराया जा सकता है। ग्राहक को कीमत में बड़ा बदलाव नजर नहीं आता, लेकिन प्रति ग्राम उत्पाद की वास्तविक लागत बढ़ जाती है।
यही वजह है कि विशेषज्ञ उपभोक्ताओं को केवल पैकेट पर लिखी कुल कीमत देखने के बजाय नेट मात्रा, यूनिट प्राइस और प्रति ग्राम या प्रति मिलीलीटर कीमत की तुलना करने की सलाह देते हैं।
छोटे पैक खरीदने वालों पर ज्यादा असर
छोटे पैकेट आम तौर पर ऐसे ग्राहकों के बीच लोकप्रिय होते हैं जो रोजाना या जरूरत के हिसाब से कम मात्रा में सामान खरीदते हैं। कम कीमत देखकर छोटे पैक खरीदना आसान लगता है। लेकिन यदि पैकेट में मात्रा लगातार घटती रहे, तो लंबे समय में उपभोक्ता को उसी बजट में कम सामान मिलता है।
त्योहारी सीजन में इसका असर और महत्वपूर्ण हो जाता है। घरों में खाद्य सामग्री, सफाई उत्पाद, व्यक्तिगत देखभाल से जुड़े सामान और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुओं की खरीद बढ़ जाती है। ऐसे समय में पैकेट की मात्रा और कीमत पर नजर रखना उपभोक्ताओं के लिए जरूरी हो जाता है।
बड़े पैक पर कीमत बढ़ने से बढ़ी चिंता
वायरल पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि जहां कुछ छोटे पैक में मात्रा में कमी की जा रही है, वहीं बड़े पैक की कीमतों में लगभग 5 से 6 प्रतिशत तक बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। हालांकि, किसी विशेष कंपनी या उत्पाद पर यह दावा लागू होता है या नहीं, इसकी पुष्टि संबंधित उत्पाद की वर्तमान पैकेजिंग और आधिकारिक मूल्य विवरण देखकर ही की जानी चाहिए।
उपभोक्ताओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अलग-अलग आकार के पैकेट खरीदते समय केवल पैकेट की कुल कीमत की तुलना न करें। कई बार बड़ा पैक देखने में किफायती लगता है, लेकिन प्रति यूनिट कीमत की गणना करने पर अंतर कम हो सकता है।
महंगाई को समझने का नया तरीका
महंगाई को आमतौर पर बाजार में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत बढ़ने से जोड़ा जाता है। लेकिन उपभोक्ता के अनुभव में महंगाई का एक दूसरा रूप भी सामने आ सकता है—समान कीमत में कम मात्रा।
इसी कारण उपभोक्ता संगठनों और बाजार विशेषज्ञों की ओर से समय-समय पर पैकेजिंग पर दी गई जानकारी को ध्यान से पढ़ने की सलाह दी जाती है। पैकेट पर दर्ज वजन या मात्रा में मामूली बदलाव भी बड़ी संख्या में खरीदारी करने वाले परिवारों के मासिक बजट को प्रभावित कर सकता है।
त्योहारों से पहले बढ़ जाती है खरीदारी
दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के आसपास बाजार में खरीदारी बढ़ जाती है। घरों में खाद्य सामग्री से लेकर सफाई, कपड़े, कॉस्मेटिक्स और घरेलू उपयोग की वस्तुओं तक की मांग बढ़ती है। ऐसे में कीमतों में छोटे बदलाव भी बड़ी संख्या में ग्राहकों को प्रभावित कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, त्योहारों की खरीदारी करते समय उपभोक्ताओं को अलग-अलग ब्रांड और पैक साइज की तुलना करनी चाहिए। यदि किसी उत्पाद का छोटा पैक सस्ता दिखाई दे रहा है तो यह देखना जरूरी है कि उसमें वास्तविक मात्रा कितनी है।
लेबल पढ़ना बन सकता है बचत का तरीका
महंगाई के दौर में उपभोक्ता के लिए पैकेट का लेबल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खरीदारी से पहले MRP, नेट मात्रा, निर्माण तिथि, एक्सपायरी डेट और प्रति यूनिट कीमत जैसी जानकारी देखना उपयोगी है। कई उत्पादों में अलग-अलग पैक साइज उपलब्ध होते हैं, इसलिए प्रति ग्राम या प्रति मिलीलीटर लागत निकालकर सही विकल्प चुना जा सकता है।
यदि किसी पैकेट की मात्रा में बदलाव हुआ है तो पैकेज पर दर्ज नेट मात्रा से इसकी जानकारी मिल सकती है। केवल पैकेट का आकार देखकर अनुमान लगाना सही नहीं है।
सोशल मीडिया दावों को भी जांचना जरूरी
वायरल पोस्ट और सोशल मीडिया पर साझा की जा रही जानकारियां उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाने में मदद कर सकती हैं, लेकिन किसी भी दावे को अंतिम तथ्य मानने से पहले उसकी स्वतंत्र पुष्टि करना जरूरी है। किसी खास ब्रांड या कंपनी पर मात्रा घटाने या कीमत बढ़ाने का आरोप लगाने से पहले संबंधित उत्पाद के पुराने और नए पैक, आधिकारिक MRP तथा नेट मात्रा की तुलना की जानी चाहिए।
महंगाई के बीच उपभोक्ताओं के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि सिर्फ कीमत नहीं, कीमत के बदले मिलने वाली मात्रा को भी देखें। अगर 20 रुपये के पैकेट में पहले 100 ग्राम सामान मिलता था और अब उसी कीमत में 90 ग्राम मिलता है, तो वास्तविक कीमत प्रति ग्राम बढ़ चुकी है, भले ही पैकेट पर छपी कुल कीमत समान दिखाई दे।
उपभोक्ताओं के लिए जरूरी सावधानी
त्योहारी खरीदारी से पहले परिवार अपने नियमित इस्तेमाल वाले सामान की सूची बना सकते हैं और अलग-अलग ब्रांड के पैक साइज की तुलना कर सकते हैं। थोक में खरीदारी करते समय भी यह देखना जरूरी है कि बड़ा पैक वास्तव में प्रति यूनिट सस्ता है या नहीं।
महंगाई के मौजूदा दौर में उपभोक्ता जागरूकता ही सबसे प्रभावी बचाव बन सकती है। पैकेट की चमकदार पैकेजिंग या कम दिखाई देने वाली कीमत के बजाय मात्रा और वास्तविक प्रति यूनिट लागत को आधार बनाकर खरीदारी करने से बजट को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।
नोट: ऊपर दी गई खबर वायरल सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए दावों और महंगाई/श्रिंकफ्लेशन की सामान्य अवधारणा पर आधारित है। किसी विशेष कंपनी या उत्पाद के संबंध में कीमत अथवा मात्रा में बदलाव की पुष्टि संबंधित उत्पाद की आधिकारिक पैकेजिंग और मूल्य जानकारी से की जानी चाहिए।