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23 महीने वेंटिलेटर पर रहा बच्चा, PGIMS ने घर लौटाई खुशियां

रोहतक स्थित पंडित भगवत दयाल शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PGIMS) में भी ऐसा ही एक उल्लेखनीय मामला सामने आया है। करीब छह वर्ष की उम्र में अस्पताल पहुंचे एक बच्चे को लंबे समय तक जीवनरक्षक सहायता की जरूरत पड़ी।

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Gauravshali Bharat News
  • October 7, 2026 7:00 pm IST, Published 2 hours ago

रोहतक। चिकित्सा जगत में कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां मरीज की गंभीर स्थिति के बावजूद चिकित्सकों की लंबी मेहनत, आधुनिक उपचार और परिवार के धैर्य से उम्मीद की नई कहानी लिखी जाती है। रोहतक स्थित पंडित भगवत दयाल शर्मा पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (PGIMS) में भी ऐसा ही एक उल्लेखनीय मामला सामने आया है। करीब छह वर्ष की उम्र में अस्पताल पहुंचे एक बच्चे को लंबे समय तक जीवनरक्षक सहायता की जरूरत पड़ी। लगभग 23 महीने तक वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहने के बाद बच्चे की हालत में धीरे-धीरे सुधार हुआ और आखिरकार उसे अस्पताल से घर भेज दिया गया।

यह मामला चिकित्सकों के साथ-साथ बच्चे के माता-पिता के लिए भी बेहद भावुक कर देने वाला रहा। अस्पताल में लंबे इलाज के बाद जब बच्चे को डिस्चार्ज किया गया तो चिकित्सा टीम और परिजनों के बीच खुशी का माहौल बन गया। यह घटना गंभीर मरीजों के उपचार में लगातार निगरानी, बहु-विषयक चिकित्सा टीम और परिवार के सहयोग की अहमियत को भी सामने लाती है।

तेज बुखार और गंभीर हालत में पहुंचा था बच्चा

जानकारी के अनुसार, बच्चा 5 अक्टूबर 2024 को PGIMS के पीआईसीयू यानी पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती हुआ था। उस समय उसकी स्थिति बेहद गंभीर थी। उसे तेज दिमागी बुखार था और वह अपने हाथ-पैर तक ठीक से नहीं हिला पा रहा था। बीच-बीच में उसे दौरे भी पड़ रहे थे।

बच्चे की गंभीर स्थिति को देखते हुए चिकित्सकों ने तत्काल गहन उपचार शुरू किया। उसकी सांस और शरीर की स्थिति को स्थिर रखने के लिए लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता पड़ी। ऑक्सीजन की जरूरत भी बेहद अधिक थी और उपचार के दौरान उसे 100 प्रतिशत ऑक्सीजन सपोर्ट देना पड़ा।

ऐसे हालात में किसी बच्चे का लंबे समय तक जीवनरक्षक मशीनों पर निर्भर रहना चिकित्सा टीम के लिए भी बड़ी चुनौती होता है। लेकिन चिकित्सकों ने उपचार की प्रक्रिया को लगातार आगे बढ़ाया और बच्चे की स्थिति पर बारीकी से नजर रखी।

23 महीने तक चला लंबा और चुनौतीपूर्ण इलाज

बच्चे को करीब 23 महीने तक अस्पताल में उपचार और निगरानी में रखा गया। इस दौरान उसकी स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। इलाज केवल दवाओं और वेंटिलेटर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फिजियोथेरेपी और पोषण संबंधी देखभाल को भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया।

लगातार लंबे समय तक अस्पताल में रहने के कारण बच्चे को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। चिकित्सा टीम ने उसकी जरूरत के अनुसार उपचार में बदलाव किए और शरीर की ताकत वापस लाने पर भी ध्यान दिया। परिवार को भी बच्चे की देखभाल और उपचार की प्रक्रिया से लगातार जोड़े रखा गया।

अस्पताल में लगभग दो वर्ष बिताने के बाद बच्चे की स्थिति इतनी सुधरी कि वह धीरे-धीरे अपने शरीर को हिलाने-डुलाने में सक्षम होने लगा। इसके बाद चिकित्सकों ने उसे घर पर देखभाल के लिए तैयार करना शुरू किया।

दवाओं के साथ फिजियोथेरेपी और पोषण पर जोर

बच्चे के इलाज के दौरान दवाओं के साथ फिजियोथेरेपी और पोषण संबंधी सहायता को भी प्राथमिकता दी गई। लंबे समय तक गंभीर अवस्था में रहने वाले मरीजों के लिए शरीर की मांसपेशियों और सामान्य गतिविधियों को बनाए रखना बड़ी चुनौती होती है। ऐसे में नियमित फिजियोथेरेपी ने बच्चे की रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की लगातार निगरानी के साथ बच्चे के पोषण पर भी ध्यान दिया गया। उपचार के दौरान उसकी स्थिति में आने वाले छोटे-छोटे सुधारों को भी चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया।

परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक रूप से कठिन था सफर

बच्चे के पिता सोमवार दहिया गांव गढ़ी सिसाना के रहने वाले हैं और दिल्ली में टैक्सी चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं। परिवार में वह अकेले कमाने वाले हैं। बच्चे की बीमारी के बाद उन्हें अपना काम छोड़कर लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा।

बच्चे की मां भी लगातार उसके साथ अस्पताल में मौजूद रहीं। लंबे समय तक अस्पताल में रहना परिवार के लिए आर्थिक और मानसिक दोनों स्तरों पर कठिन था। परिवार के अनुसार, PGIMS में उन्हें जिस तरह की चिकित्सा सुविधा और देखभाल मिली, उससे उन्हें बड़ी राहत मिली।

परिजनों का कहना था कि यदि बच्चे का इलाज किसी महंगे निजी अस्पताल में लंबे समय तक चलता तो परिवार की आर्थिक स्थिति पर बेहद गंभीर असर पड़ सकता था। उन्होंने चिकित्सकों और पूरी टीम के प्रति आभार जताया।

डॉक्टरों की टीम ने परिवार को दिया भरोसा

बच्चे के उपचार में पीआईसीयू प्रभारी डॉ. कुंदन मित्तल और उनकी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। करीब दो साल तक बच्चे की स्थिति की लगातार निगरानी की गई। उपचार के दौरान चिकित्सकों ने परिवार को समय-समय पर बच्चे की स्थिति के बारे में जानकारी दी और उन्हें उम्मीद बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।

डिस्चार्ज के समय PGIMS की कुलपति डॉ. एचके अग्रवाल भी पीआईसीयू पहुंचीं। उन्होंने बच्चे को स्वस्थ होकर घर जाते देखा और चिकित्सकों तथा नर्सिंग स्टाफ का उत्साह बढ़ाया। उन्होंने गंभीर स्थिति में पहुंचे बच्चे को उपचार के बाद घर भेजे जाने को चिकित्सा टीम की मेहनत का परिणाम बताया।

कुलपति ने चिकित्सकों की टीम की सराहना करते हुए कहा कि किसी गंभीर मरीज को स्वस्थ होकर अपने परिवार के पास लौटते देखना चिकित्सा क्षेत्र में काम करने वालों के लिए सबसे संतोषजनक क्षणों में से एक होता है।

अब घर पर होगी बच्चे की देखभाल

डॉ. कुंदन मित्तल के अनुसार, बच्चे की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार आया है और अब वह स्थिर है। परिवार को घर पर उसकी देखभाल के संबंध में आवश्यक जानकारी दी गई है। आगे भी फॉलोअप के दौरान बच्चे की स्वास्थ्य स्थिति पर नजर रखी जाएगी।

यह मामला इस बात का उदाहरण है कि अत्यंत गंभीर स्थिति में भी उपचार की निरंतरता, विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम, नर्सिंग देखभाल, फिजियोथेरेपी, पोषण और परिवार के सहयोग से मरीज की स्थिति में सुधार की संभावना बनी रहती है।

करीब 23 महीने तक अस्पताल में रहने के बाद बच्चे का घर लौटना परिवार के लिए केवल डिस्चार्ज नहीं, बल्कि लंबे संघर्ष के बाद मिली एक बड़ी राहत है। जिस बच्चे के जीवन को बचाने के लिए कभी लगातार वेंटिलेटर और 100 प्रतिशत ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही थी, उसका धीरे-धीरे स्थिर होकर घर लौटना PGIMS की चिकित्सा टीम के लिए भी एक भावुक और उपलब्धि भरा क्षण रहा।

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