वाराणसीः उत्तर प्रदेश में प्रतिबंधित मांझे का कहर लगातार लोगों की जान ले रहा है। वाराणसी में पतंग के मांझे से गला कटने के कारण 55 वर्षीय सुनील कुमार की मौत की घटना ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था, पुलिस की निगरानी और प्रतिबंधित मांझे की बिक्री पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि यह दर्दनाक हादसा कज्जाकपुरा फ्लाईओवर पर हुआ, जहां मंदिर में दर्शन करने के बाद घर लौट रहे सुनील कुमार अचानक पतंग के मांझे की चपेट में आ गए। घटना इतनी गंभीर थी कि उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला।
जानकारी के मुताबिक, आशापुर निवासी सुनील कुमार गुजराती साड़ी के कारोबार से जुड़े थे। नवरात्रि के पहले दिन वह मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे। दर्शन के बाद जब वह वापस लौट रहे थे, तभी कज्जाकपुरा फ्लाईओवर पर उड़ती पतंग का मांझा उनके गले में फंस गया। धारदार मांझे से उनकी गर्दन कट गई और वह गंभीर रूप से घायल होकर सड़क पर गिर पड़े। अचानक हुए इस हादसे से मौके पर अफरा-तफरी मच गई।
घटनास्थल पर मौजूद विकास नाम के एक युवक ने घायल सुनील कुमार को तत्काल बाइक पर बैठाकर अस्पताल पहुंचाने की कोशिश की। हालांकि, चोट इतनी गंभीर थी कि उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। एक सामान्य दिन की तरह मंदिर दर्शन के लिए घर से निकले व्यक्ति की इस तरह मौत हो जाना परिवार और परिचितों के लिए बड़ा सदमा है। इस घटना ने सड़क पर चलने वाले आम लोगों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।
वाराणसी की इस घटना से पहले गोरखपुर में भी मांझे से जुड़ी एक ऐसी ही दर्दनाक घटना सामने आने की जानकारी है। बताया गया कि वहां रमेश कन्नौजिया की जान भी इसी तरह चली गई थी। लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि प्रतिबंधित और जानलेवा मांझे की समस्या केवल किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। यदि समय रहते इसकी बिक्री, भंडारण और इस्तेमाल पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई, तो सड़क पर निकलने वाले लोगों के लिए खतरा बना रह सकता है।
पुलिस की ओर से 48 घंटे का विशेष अभियान चलाने की बात कही गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या कुछ घंटों या दिनों तक चलने वाला अभियान इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकता है? जरूरत ऐसी कार्रवाई की है, जो केवल हादसे के बाद सक्रिय होने तक सीमित न रहे, बल्कि प्रतिबंधित मांझे की आपूर्ति और बिक्री के स्रोतों तक पहुंचे। जिन दुकानों से ऐसा मांझा बेचे जाने की आशंका है, उनकी जांच की जानी चाहिए और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
इस समस्या के लिए केवल प्रशासन को जिम्मेदार ठहराना भी पर्याप्त नहीं होगा। पतंग उड़ाने के शौक में दूसरों की जान जोखिम में डालने वालों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यह मान लेना गलत है कि मांझे का इस्तेमाल केवल कम उम्र के बच्चे करते हैं। यदि वयस्क लोग भी जानलेवा मांझे का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो उनकी पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई करना जरूरी है। हालांकि, किसी उम्र या समूह के सभी लोगों को दोषी मानने के बजाय वास्तविक उल्लंघन करने वालों पर ध्यान देना चाहिए।
पुलिस चाहे तो सार्वजनिक स्थानों पर निगरानी बढ़ाकर, शिकायतों पर तेजी से कार्रवाई करके और बिक्री के स्रोतों की जांच करके इस समस्या पर लगाम लगाने की कोशिश कर सकती है। इसके साथ ही लोगों को सुरक्षित पतंगबाजी के प्रति जागरूक करना भी जरूरी है। सुनील कुमार और रमेश कन्नौजिया की मौत जैसी घटनाएं केवल खबर बनकर न रह जाएं, इसके लिए प्रशासन, पुलिस, दुकानदारों और आम नागरिकों को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी। आखिरकार, पतंग उड़ाने का आनंद किसी परिवार की खुशियां छीनने की कीमत पर नहीं होना चाहिए।