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नाबालिग के साथ रहने के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने टिप्पणी की कि किशोरावस्था में आकर्षण और भावनात्मक बदलाव स्वाभाविक हो सकते हैं, लेकिन ऐसे मामलों में कानूनी सुरक्षा और संबंधित व्यक्तियों की परिस्थितियों के बीच संतुलन पर विचार करना भी जरूरी है। पीठ ने सुझाव दिया कि राज्य को नाबालिगों को बालिग होने तक शिक्षा और रोजगार से जुड़े कौशल उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना...

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  • October 13, 2026 2:48 pm IST, Published 19 minutes ago

प्रयागराज:  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिगों के आपसी संबंधों और ऐसे मामलों में पॉक्सो कानून के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। अदालत ने कहा कि कुछ मामलों में अशिक्षा, गरीबी और सामाजिक परिस्थितियों को भी समझना जरूरी है। साथ ही, भारतीय सामाजिक परिवेश को ध्यान में रखते हुए पॉक्सो अधिनियम में संभावित संशोधनों पर विचार करने के लिए विधि आयोग को आदेश की प्रति भेजने का निर्देश दिया। यह टिप्पणी बांदा के एक युवक की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण करते हुए की गई।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने की। याचिकाकर्ता युवक के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत मामला दर्ज था। आरोप था कि वह एक लड़की के साथ घर से चला गया और दोनों साथ रहने लगे। एक सितंबर 2025 को उन्होंने पति-पत्नी के रूप में रहने संबंधी शपथपत्र भी बनवाया था। हालांकि, लड़की के पिता ने उसकी उम्र और दोनों के बीच कथित सपिंड संबंध का हवाला देते हुए इस रिश्ते पर आपत्ति जताई थी।

लड़की के पिता के मुताबिक, उसकी बेटी का जन्म 25 जुलाई 2010 को हुआ था और वह नाबालिग है। बरामदगी के बाद लड़की को बाल गृह भेज दिया गया था। अदालत में बताया गया कि वहां रहते हुए उसने एक बच्चे को जन्म दिया, जिसकी उम्र सुनवाई के समय दो महीने से अधिक थी। पिता की आपत्ति का एक अन्य आधार यह था कि युवक और लड़की के बीच सात पीढ़ियों के भीतर रक्त संबंध होने का दावा किया गया, जिसके कारण विवाह की वैधता पर सवाल उठाया गया। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की परिस्थितियों पर विचार किया। लड़की ने बताया कि उसने केवल पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। वह हिंदी अखबार नहीं पढ़ सकती, हालांकि अपने हस्ताक्षर कर सकती है। अदालत ने इस तथ्य के संदर्भ में अशिक्षा और सामाजिक जागरूकता की कमी जैसे पहलुओं पर ध्यान दिलाया। पीठ ने कहा कि कानून लागू करते समय देश के सामाजिक यथार्थ और निरक्षर या अल्पशिक्षित लोगों की परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की कि किशोरावस्था में आकर्षण और भावनात्मक बदलाव स्वाभाविक हो सकते हैं, लेकिन ऐसे मामलों में कानूनी सुरक्षा और संबंधित व्यक्तियों की परिस्थितियों के बीच संतुलन पर विचार करना भी जरूरी है। पीठ ने सुझाव दिया कि राज्य को नाबालिगों को बालिग होने तक शिक्षा और रोजगार से जुड़े कौशल उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना चाहिए, ताकि वे भविष्य में स्वतंत्र निर्णय लेने के लिए अधिक सक्षम बन सकें।

खंडपीठ ने विधि आयोग से यह भी विचार करने को कहा कि क्या असाधारण परिस्थितियों वाले मामलों में विशेष अदालत के न्यायाधीश को सजा तय करने में सीमित विवेकाधिकार दिया जा सकता है। अदालत ने सामुदायिक सेवा जैसी वैकल्पिक सजा के विकल्प पर भी विचार करने का सुझाव दिया। पीठ की टिप्पणियों का संदर्भ उन मामलों से था, जहां सामाजिक और शैक्षिक परिस्थितियों के कारण बने रिश्तों के परिणामस्वरूप परिवार और बच्चे प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, इस टिप्पणी को पॉक्सो कानून में किसी बदलाव या उसके तहत अपराधों में स्वतः छूट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

लड़की की उम्र निर्धारित करने के मुद्दे पर अदालत के सामने उपलब्ध दस्तावेजों और चिकित्सकीय जांच का भी उल्लेख हुआ। रिकॉर्ड में पांचवीं कक्षा का स्थानांतरण प्रमाणपत्र था, जबकि नगरपालिका का जन्म प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं बताया गया। इसके अलावा, ओसिफिकेशन टेस्ट के आधार पर उसकी उम्र लगभग 18 वर्ष होने का अनुमान सामने आया। इन तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने इस मामले में लड़की को बालिग मानकर उसे युवक के साथ जाने की अनुमति दे दी।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आदेश में की गई तथ्यात्मक टिप्पणियों का संबंधित आपराधिक मुकदमे की सुनवाई पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका अर्थ है कि ट्रायल कोर्ट मामले के साक्ष्यों और कानून के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकेगा। इस तरह अदालत ने याचिका का निस्तारण करते हुए एक ओर लड़की की उम्र और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार किया, वहीं दूसरी ओर पॉक्सो कानून के सामाजिक संदर्भ और संभावित विधायी सुधारों पर विमर्श की जरूरत भी रेखांकित की।

 

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