आजमगढ़ के बिजौली में मनरेगा और अमृत सरोवर पर गंभीर आरोप

एलएलबी छात्र दयानंद उपाध्याय ने उठाए सवाल, जांच रिपोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई की मांग

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  • October 25, 2026 7:20 pm IST, Published 40 minutes ago

आजमगढ़, उत्तर प्रदेश। आजमगढ़ जिले के बिजौली ग्राम सभा में मनरेगा के कार्यों और अमृत सरोवर के निर्माण एवं रखरखाव को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। शिकायतकर्ता और एलएलबी के छात्र दयानंद उपाध्याय ने ग्राम सभा में विकास कार्यों के नाम पर सरकारी धन के कथित दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए निष्पक्ष जांच और साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करने की मांग की है। उनके अनुसार, मामले की जांच के लिए जिला कृषि अधिकारी, उप जिला कृषि अधिकारी और सहायक अभियंता की टीम गांव पहुंची थी।

शिकायतकर्ता का दावा है कि गांव में मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों और सरकारी अभिलेखों में दर्ज विवरण के बीच अंतर है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई कार्य केवल कागजों पर दिखाए गए हैं, जबकि मौके पर उनकी वास्तविक स्थिति अलग है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और जांच अधिकारियों की अंतिम रिपोर्ट सामने आने के बाद ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

मनरेगा के कार्यों को लेकर उठाए सवाल

दयानंद उपाध्याय ने आरोप लगाया कि बिजौली ग्राम सभा में मनरेगा के तहत कार्य कराए जाने के दावों की जमीनी स्तर पर जांच होनी चाहिए। उनके मुताबिक, मौके पर विकास कार्यों के पर्याप्त प्रमाण दिखाई नहीं देते। उन्होंने दावा किया कि निरीक्षण के दौरान अधिकारियों के सामने भी काम की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठाए गए।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में कार्यों को पूरा दिखाया गया है, तो उनकी भौतिक स्थिति, भुगतान से जुड़े दस्तावेज और कार्यस्थल पर उपलब्ध साक्ष्यों का मिलान किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि मनरेगा के तहत स्वीकृत कार्यों, मजदूरों की उपस्थिति, भुगतान विवरण और निर्माण संबंधी अभिलेखों की जांच की जाए, ताकि यह पता चल सके कि सरकारी धन का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं।

अमृत सरोवर पर 25 से 30 लाख रुपये के कथित घोटाले का आरोप

मामले में सबसे गंभीर आरोप अमृत सरोवर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता दयानंद उपाध्याय ने दावा किया कि सरोवर के नाम पर लगभग 25 से 30 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता हुई है। उन्होंने आरोप लगाया कि खर्च और निर्माण संबंधी दावों की तुलना में मौके पर उपलब्ध सुविधाएं बेहद सीमित दिखाई देती हैं।

शिकायतकर्ता के अनुसार, सरोवर परिसर में मुख्य रूप से एक डमरू जैसी संरचना और सीढ़ियां दिखाई देती हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि परियोजना पर इतनी बड़ी राशि खर्च की गई है, तो निर्माण कार्यों, सौंदर्यीकरण, जल संरक्षण और अन्य सुविधाओं की वास्तविक स्थिति का स्पष्ट हिसाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

हालांकि, कथित घोटाले की राशि और खर्च का वास्तविक विवरण सरकारी अभिलेखों, स्वीकृत परियोजना, तकनीकी आकलन, माप पुस्तिका और भुगतान संबंधी दस्तावेजों की जांच के बाद ही प्रमाणित हो सकता है।

वृक्षारोपण के नाम पर बार-बार भुगतान का आरोप

दयानंद उपाध्याय ने अमृत सरोवर के आसपास वृक्षारोपण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पूर्व प्रधान से लेकर वर्तमान प्रधान के कार्यकाल तक एक ही अमृत सरोवर पर चार बार वृक्षारोपण कराए जाने का उल्लेख किया गया और इसके लिए धनराशि निकाली गई, लेकिन मौके पर पेड़ दिखाई नहीं देते।

यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय होगा कि वृक्षारोपण के लिए कितनी धनराशि स्वीकृत हुई, पौधों की खरीद कहां से की गई, पौधरोपण कब हुआ और उनके संरक्षण की क्या व्यवस्था थी।

इस संबंध में संबंधित अभिलेखों, पौधों की खरीद के बिल, भुगतान विवरण, निरीक्षण रिपोर्ट और स्थल की वर्तमान स्थिति का मिलान जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि वृक्षारोपण वास्तव में हुआ था या नहीं और यदि हुआ था, तो पौधों के जीवित रहने तथा रखरखाव की क्या स्थिति है।

साफ-सफाई नहीं होने से ग्रामीणों को परेशानी

शिकायतकर्ता ने अमृत सरोवर की साफ-सफाई और रखरखाव पर भी नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि परिसर की नियमित सफाई नहीं होने के कारण ग्रामीणों को वहां टहलने और समय बिताने में परेशानी होती है।

अमृत सरोवर जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य केवल निर्माण कराना नहीं, बल्कि जल संरक्षण, स्थानीय पर्यावरण में सुधार और ग्रामीणों को सार्वजनिक उपयोग की सुविधा उपलब्ध कराना भी है। ऐसे में सरोवर के रखरखाव, पानी की गुणवत्ता, आसपास की स्वच्छता और जनसुविधाओं की स्थिति की जांच महत्वपूर्ण मानी जाती है।

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि संबंधित विभाग यह भी स्पष्ट करे कि सरोवर की सफाई और रखरखाव के लिए कोई बजट निर्धारित किया गया था या नहीं। यदि बजट खर्च हुआ है, तो उसके उपयोग और कार्यों की वास्तविक स्थिति की जांच की जानी चाहिए।

मत्स्य पालन और आय के इस्तेमाल पर भी सवाल

दयानंद उपाध्याय ने अमृत सरोवर में मत्स्य पालन को लेकर भी आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि सरोवर में मछली पालन कराया जाता है और मछलियां बेचने से प्राप्त धन के इस्तेमाल में पारदर्शिता नहीं है। उन्होंने इस संबंध में आय और व्यय का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग की है।

इस आरोप की जांच के लिए यह पता लगाना आवश्यक होगा कि सरोवर में मत्स्य पालन की अनुमति किसे दी गई, संबंधित अनुबंध या पट्टे की शर्तें क्या थीं, मछली बिक्री से कितनी आय हुई और उस धनराशि का इस्तेमाल किस मद में किया गया।

यदि सरकारी या ग्राम पंचायत के संसाधनों से आय अर्जित की गई है, तो उससे संबंधित रिकॉर्ड का परीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आय का लेखा-जोखा नियमानुसार रखा गया है।

अधिकारियों से निष्पक्ष जांच और जवाबदेही की मांग

शिकायतकर्ता ने कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदारी तय करने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि भुगतान और धनराशि के इस्तेमाल की प्रक्रिया में विभिन्न स्तरों पर बंदरबांट हुई है। उन्होंने ऑपरेटर, संबंधित कर्मचारियों, अधिकारियों और कथित बिचौलियों की भूमिका की जांच कराने की मांग की है।

इन आरोपों के संबंध में किसी भी व्यक्ति या अधिकारी की जिम्मेदारी तभी निर्धारित की जा सकती है, जब दस्तावेजी साक्ष्य, भुगतान रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्ष सामने आएं। इसलिए मामले में निष्पक्ष जांच और सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक है।

जिलाधिकारी से साक्ष्यों के आधार पर रिपोर्ट लगाने की मांग

दयानंद उपाध्याय ने जिलाधिकारी से मांग की है कि मौके पर उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों के आधार पर सही जांच आख्या तैयार कराई जाए। उनका कहना है कि रिपोर्ट में केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय स्थल की वास्तविक स्थिति और संबंधित अभिलेखों का मिलान किया जाना चाहिए।

उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जांच रिपोर्ट तथ्यों और साक्ष्यों के अनुरूप नहीं तैयार की गई, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे। शिकायतकर्ता ने कहा कि वह पिछले आठ महीने से इस मामले को लेकर संघर्ष कर रहे हैं और जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई भी लड़ेंगे।

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

बिजौली ग्राम सभा से जुड़े इन आरोपों के बाद अब जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे। ग्रामीण विकास योजनाओं में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि स्वीकृत बजट, निर्माण कार्यों, भुगतान, वृक्षारोपण, सफाई और मत्स्य पालन से संबंधित रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच की जाए।

फिलहाल, शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। जांच रिपोर्ट में यदि अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जा सकती है। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं, तो तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।

नोट: यह समाचार शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण पर आधारित है। कथित वित्तीय अनियमितताओं की अंतिम पुष्टि संबंधित विभाग की जांच रिपोर्ट, आधिकारिक दस्तावेजों और सक्षम प्राधिकारी के निष्कर्षों के बाद ही होगी।

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