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सुप्रीम कोर्ट की मंत्रालय को फटकार, NCLT-NCLAT की स्वायत्तता पर उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि मामला केवल संविदा कर्मचारियों की नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की महत्वपूर्ण न्यायिक संस्थाओं की प्रशासनिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा है। NCLT और NCLAT कॉरपोरेट विवादों, दिवालियापन और कंपनियों से संबंधित मामलों के निपटारे में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन संस्थानों के पास पर्याप्त प्रशासनिक अधिकार और स्वतंत्र...

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • October 30, 2026 10:31 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की प्रशासनिक स्वायत्तता को लेकर कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने टिप्पणी की कि मंत्रालय ने इन दोनों महत्वपूर्ण संस्थानों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अदालत ने कहा कि न्यायिक संस्थानों की स्वतंत्रता और निष्पक्ष कामकाज सुनिश्चित करने के लिए उनकी प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक स्वायत्त बनाया जाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से NCLT और NCLAT के अध्यक्षों की नियुक्ति तथा संस्थानों के प्रशासनिक संचालन में स्वतंत्रता की आवश्यकता पर जोर दिया। पीठ ने सुझाव दिया कि नियमित भर्ती की प्रक्रिया पूरी होने तक अंतरिम व्यवस्था के तहत प्रतिनियुक्ति पर अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति की जा सकती है। इसके साथ ही अदालत ने UPSC और कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी संस्थाओं के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से स्थायी भर्तियां करने का विकल्प भी सुझाया।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में यह मामला NCLT में कार्यरत संविदा कर्मचारियों की नियुक्ति और उनकी सेवा व्यवस्था से जुड़ी याचिका के संदर्भ में सामने आया। सुनवाई के दौरान कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया को निजी एजेंसी के माध्यम से संचालित किए जाने पर आपत्ति जताई गई। वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि NCLT में कर्मचारियों की नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया एक निजी एजेंसी को सौंप दी गई है। इस व्यवस्था में न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारी भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि कई कर्मचारी पिछले करीब आठ वर्षों से NCLT में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें अचानक नौकरी से हटाए जाने की आशंका है। अदालत को बताया गया कि संबंधित कर्मचारियों को एक या दो नवंबर से हटाया जा सकता है। इससे न केवल उनकी आजीविका प्रभावित होगी, बल्कि ट्रिब्यूनल के दैनिक कामकाज पर भी असर पड़ सकता है।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी चिंता जताई कि न्यायिक सदस्यों के साथ काम करने वाले कर्मचारियों की नियुक्ति और नियंत्रण यदि पूरी तरह किसी निजी एजेंसी के हाथ में चला जाता है, तो संस्थान की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है। ऐसे कर्मचारियों को न्यायिक कामकाज से जुड़े महत्वपूर्ण दायित्व निभाने होते हैं। इसलिए उनकी सेवा शर्तों और प्रशासनिक जवाबदेही का सीधा संबंध संबंधित न्यायिक संस्थान से होना चाहिए।

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिका के व्यक्तिगत पहलुओं और व्यापक संस्थागत हित के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि अदालत ऐसे कर्मचारियों की याचिका पर विचार करने के पक्ष में नहीं है, जिनका इस मामले में सीधे तौर पर व्यक्तिगत हित जुड़ा हुआ है। हालांकि, यदि NCLT के अध्यक्ष स्वयं मौजूदा भर्ती और नियुक्ति व्यवस्था को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर व्यापक संस्थागत हित को ध्यान में रखते हुए विचार कर सकता है।

पीठ में शामिल न्यायमूर्ति बागची ने भी भर्ती प्रक्रिया और कर्मचारियों के वास्तविक नियोक्ता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों की भर्ती की प्रक्रिया को किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम से कराया जा सकता है, लेकिन इससे नियोक्ता और कर्मचारी के बीच का मूल संबंध समाप्त नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार, कर्मचारियों का संस्थागत संबंध NCLT के साथ ही बना रहना चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ट्रिब्यूनल के कामकाज में निजी एजेंसियों का अनावश्यक हस्तक्षेप न हो।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से स्पष्ट है कि मामला केवल संविदा कर्मचारियों की नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की महत्वपूर्ण न्यायिक संस्थाओं की प्रशासनिक स्वतंत्रता से भी जुड़ा है। NCLT और NCLAT कॉरपोरेट विवादों, दिवालियापन और कंपनियों से संबंधित मामलों के निपटारे में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इन संस्थानों के पास पर्याप्त प्रशासनिक अधिकार और स्वतंत्र कर्मचारी व्यवस्था होना उनके प्रभावी संचालन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आगे की कार्रवाई को NCLT के अध्यक्ष की रिपोर्ट से जोड़ दिया है। अदालत संबंधित रिपोर्ट मिलने के बाद भर्ती व्यवस्था और संस्थागत स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार करेगी। अब सबकी नजर इस बात पर है कि NCLT अध्यक्ष अपनी रिपोर्ट में क्या सुझाव देते हैं और सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे क्या दिशा-निर्देश जारी करता है।


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