अधिकारियों ने संबंधित लोगों से पूछताछ भी की। सूत्रों के मुताबिक, छापेमारी के दौरान कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज और डिजिटल उपकरण जब्त किए गए हैं। जांच एजेंसी इन रिकॉर्ड के माध्यम से कर्ज की रकम के इस्तेमाल और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन की जानकारी जुटाने में लगी है।दरअसल, जांच के केंद्र में कोहिनूर पावर प्राइवेट लिमिटेड की ओर से झारखंड में 66 मेगावाट क्षमता का बिजली संयंत्र स्थापित करने के लिए बैंकों के एक समूह से लिया गया लगभग 290 करोड़ रुपये का कर्ज है। आरोप है कि कंपनी ने बिजली परियोजना के लिए यह भारी भरकम रकम हासिल की थी, लेकिन बाद में इस धन का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्य के बजाय अन्य माध्यमों से किए जाने की आशंका सामने आई।
ईडी को संदेह है कि कर्ज की रकम को कथित तौर पर कई कंपनियों और निजी बैंक खातों के माध्यम से स्थानांतरित किया गया। जांच एजेंसी इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कहीं फर्जी कंपनियों का नेटवर्क बनाकर बैंक से प्राप्त धन को अलग-अलग खातों में तो नहीं भेजा गया। इसी वित्तीय लेनदेन की कड़ियां जोड़ने और इसमें शामिल लोगों की भूमिका का पता लगाने के लिए बंगाल के अलग-अलग जिलों में एक साथ तलाशी अभियान चलाया गया। इस कार्रवाई के दौरान लेकटाउन स्थित अवनी ऑक्सफोर्ड आवासीय परिसर में चार्टर्ड अकाउंटेंट अशोक सारथी के आवास की तलाशी ली गई। इसके अलावा हुगली जिले के उत्तरपाड़ा स्थित शिवतला स्ट्रीट में रहने वाले चार्टर्ड अकाउंटेंट सुदीप्त घोष के घर पर भी ईडी की टीम पहुंची। यहां अधिकारियों ने दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की तथा उनसे मामले से जुड़े सवाल पूछे।
सुदीप्त घोष ने कथित वित्तीय अनियमितताओं में अपनी किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया है। उन्होंने जांच एजेंसी के साथ सहयोग करने की बात कही है। फिलहाल ईडी संबंधित व्यक्तियों की भूमिका और कंपनी से जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच कर रही है। छापेमारी में मिले दस्तावेजों और डिजिटल उपकरणों की पड़ताल के बाद मामले में आगे की कार्रवाई की जा सकती है।इस पूरे मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू कंपनी की दिवाला प्रक्रिया से भी जुड़ा है। कोहिनूर पावर प्राइवेट लिमिटेड बाद में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की प्रक्रिया के तहत पहुंच गई थी। कंपनी के परिसमापन के दौरान बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को उनके बकाया कर्ज के मुकाबले बेहद कम रकम वापस मिल सकी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, लगभग 290 करोड़ रुपये के कर्ज के मुकाबले केवल सात करोड़ रुपये की वसूली हुई। इस कारण कर्जदाताओं को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ा।
अब ईडी इस पूरे मामले की जांच धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कर रही है। एजेंसी का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि बिजली परियोजना के नाम पर प्राप्त धन का वास्तविक इस्तेमाल कहां हुआ, किन कंपनियों के खातों में रकम भेजी गई और इस कथित वित्तीय गड़बड़ी में किन लोगों की भूमिका रही। बैंकों से मिले कर्ज की इतनी बड़ी रकम का वापस नहीं मिलना और कंपनी का दिवाला प्रक्रिया में पहुंचना इस मामले को गंभीर बनाता है। फिलहाल जांच एजेंसी दस्तावेजों, बैंकिंग रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर पूरे वित्तीय नेटवर्क की पड़ताल कर रही है। ईडी की जांच पूरी होने के बाद ही कथित धन शोधन और बैंक ऋण के दुरुपयोग से जुड़े आरोपों की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।