इन चुनावों में सबसे ज्यादा चर्चा जातीय समीकरणों और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) से जुड़े विवाद की रही। राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या यूजीसी विवाद ने सवर्ण मतदाताओं को एकजुट किया या उम्मीदवारों की व्यक्तिगत लोकप्रियता और स्थानीय मुद्दों ने नतीजों को प्रभावित किया। आठ सीटों में छह सवर्ण उम्मीदवारों की जीत के बाद इस चर्चा को और बल मिला है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर पूरे चुनाव को जातीय ध्रुवीकरण का परिणाम मानना उचित नहीं होगा।
राजद की रणनीति को समझने के लिए पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यहां बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पांच बार के विधान पार्षद नवल किशोर यादव को राजद के डॉ. संजीव कुमार सिंह ने 1,057 मतों से पराजित कर दिया। डॉ. संजीव कुमार को 4,487 वोट मिले, जबकि नवल किशोर यादव को 3,430 मत प्राप्त हुए। इस जीत के साथ बीजेपी का इस सीट पर करीब तीन दशक पुराना दबदबा समाप्त हो गया। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, लालू प्रसाद यादव ने इस चुनाव में परंपरागत मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के साथ भूमिहार मतदाताओं को जोड़ने की रणनीति अपनाई। डॉ. संजीव कुमार की सामाजिक पृष्ठभूमि और स्थानीय संपर्कों को इस रणनीति का अहम हिस्सा माना गया। वह पहले जदयू से जुड़े थे, लेकिन बाद में राजद में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतरे। माना जा रहा है कि मुस्लिम, यादव और भूमिहार मतों के संभावित तालमेल ने उनकी जीत का रास्ता मजबूत किया। इस नतीजे ने यह संकेत दिया कि राजद अब अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे नए सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है।
दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम भी राजद के लिए महत्वपूर्ण रहा। यहां शुरुआती मतगणना में बीजेपी के सर्वेश कुमार को आगे बताया जा रहा था, लेकिन दूसरी वरीयता के मतों की गिनती के बाद तस्वीर बदल गई। अंततः राजद के अनिल कुमार झा ने जीत दर्ज की। इस सीट पर ब्राह्मण, मुस्लिम और यादव मतदाताओं के संभावित समीकरण को राजद की सफलता की वजहों में गिना जा रहा है। यह परिणाम बताता है कि विधान परिषद चुनाव में केवल पहली पसंद के वोट ही नहीं, बल्कि दूसरी वरीयता के मत भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। दूसरी तरफ बीजेपी के नेताओं ने चुनाव परिणामों को जातीय गोलबंदी या यूजीसी विवाद का सीधा नतीजा मानने से इनकार किया है। बीजेपी विधायक मनोज कुमार शर्मा का कहना है कि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता शिक्षित होते हैं और वे उम्मीदवार की योग्यता तथा व्यक्तिगत छवि को ध्यान में रखकर मतदान करते हैं। उन्होंने कहा कि कई सीटों पर मुकाबला सवर्ण उम्मीदवारों के बीच था, इसलिए किसी एक उम्मीदवार की जीत को जातीय समीकरण से जोड़ना सही नहीं होगा।

हालांकि, मनोज शर्मा ने यह भी स्वीकार किया कि कुछ सीटों पर यूजीसी विवाद का प्रभाव देखने को मिला। उन्होंने पटना शिक्षक सीट पर हार की वजह समझाते हुए कहा कि वरीयता आधारित मतगणना में बाद के चरणों में दूसरे उम्मीदवारों के वोटों का हस्तांतरण निर्णायक साबित हुआ। उनके अनुसार, इसी प्रक्रिया में राजद प्रत्याशी को फायदा मिला। कांग्रेस के पूर्व मुख्य प्रवक्ता और तिरहुत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्याशी रहे राजेश राठौड़ ने भी चुनाव में यूजीसी विवाद के प्रभाव की बात कही। उनके मुताबिक, कुछ क्षेत्रों में सवर्ण मतदाताओं ने अपने समुदाय के मजबूत उम्मीदवारों का समर्थन किया। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मौजूदा विधान पार्षदों के प्रति नाराजगी एक बड़ा कारण रही। चारों शिक्षक सीटों पर पुराने प्रतिनिधियों को हार का सामना करना पड़ा। इससे संकेत मिलता है कि शिक्षकों के बीच अपने प्रतिनिधियों के कामकाज को लेकर असंतोष था। इन चुनावों में शिक्षक और स्नातक सीटों के नतीजों में भी अंतर देखने को मिला। चारों शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मौजूदा विधान पार्षद अपनी सीट नहीं बचा सके, जबकि चार स्नातक सीटों में तीन पर पुराने प्रतिनिधियों ने दोबारा जीत हासिल की। कुल परिणामों में एनडीए को तीन सीटें मिलीं।
बीजेपी ने दो और जदयू ने एक सीट जीती। राजद के खाते में दो सीटें आईं। जन सुराज पार्टी ने दरभंगा शिक्षक सीट जीतकर विधान परिषद में पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, जबकि दो सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने जीत हासिल की। इन नतीजों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बिहार में आने वाले वर्षों में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की राजनीतिक तैयारी शुरू होगी। राजद के लिए यह परिणाम नए सामाजिक समीकरण बनाने का अवसर हो सकता है। वहीं बीजेपी और एनडीए के लिए यह आत्ममंथन का संकेत है कि मजबूत संगठन और सत्ता में होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर मतदाताओं की नाराजगी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बिहार विधान परिषद के चुनावों ने लालू प्रसाद यादव की रणनीतिक सक्रियता, जातीय समीकरणों और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत स्वीकार्यता को एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में ला दिया है।