नई दिल्ली। भारतीय स्मार्टफोन बाजार में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले कई वर्षों से भारतीय मोबाइल बाजार पर मजबूत पकड़ बनाए रखने वाली चीनी स्मार्टफोन कंपनियों के सामने अब नई चुनौतियां खड़ी होती दिखाई दे रही हैं। दूसरी ओर, भारतीय स्मार्टफोन ब्रांड एक बार फिर अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। किफायती कीमत, स्थानीय बाजार की जरूरतों और ग्राहकों की बदलती पसंद ने घरेलू कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।
इस बदलाव ने टेक्नोलॉजी उद्योग में एक नई बहस शुरू कर दी है कि क्या भारतीय स्मार्टफोन कंपनियां एक बार फिर चीनी ब्रांड्स को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में पहुंच रही हैं? बाजार से जुड़े आंकड़ों के हवाले से सामने आई रिपोर्ट में भारतीय ब्रांडों की हिस्सेदारी बढ़ने और चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी में गिरावट का दावा किया गया है। हालांकि, इस बदलाव को समझने के लिए बाजार हिस्सेदारी, बिक्री और वास्तविक भारतीय विनिर्माण के बीच अंतर को भी समझना जरूरी है।
ताजा बाजार रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में भारत में चीनी स्मार्टफोन ब्रांडों की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी घटकर लगभग 67 से 68 प्रतिशत रह गई। एक साल पहले इसी अवधि में यह हिस्सेदारी करीब 75 प्रतिशत थी। यानी एक वर्ष के भीतर चीनी कंपनियों को बाजार में लगभग सात से आठ प्रतिशत अंकों का नुकसान हुआ है।
टेक्नोलॉजी रिसर्च कंपनी ओमडिया (Omdia) के मुताबिक, जून तिमाही में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी लगभग 71 प्रतिशत थी, जो सितंबर तिमाही में घटकर 68 प्रतिशत रह गई। वहीं काउंटरपॉइंट रिसर्च (Counterpoint Research) ने इसे 67 प्रतिशत आंका है। यह गिरावट वर्ष 2018 के बाद सबसे निचले स्तरों में से एक मानी जा रही है।
इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि चीनी कंपनियां भारतीय बाजार से बाहर हो रही हैं, बल्कि यह संकेत है कि बाजार में उनका पहले जैसा दबदबा कमजोर पड़ रहा है। खासकर कम कीमत वाले स्मार्टफोन सेगमेंट में प्रतिस्पर्धा का समीकरण बदल रहा है।
चीनी स्मार्टफोन कंपनियों की परेशानी के पीछे सबसे बड़ी वजह मेमोरी चिप की बढ़ती कीमतें बताई जा रही हैं। स्मार्टफोन में रैम और इंटरनल स्टोरेज के लिए इस्तेमाल होने वाली मेमोरी चिप की कीमतों में तेजी आने से मोबाइल बनाने की लागत बढ़ गई है।
इसका सबसे ज्यादा असर उन कंपनियों पर पड़ रहा है, जो कम कीमत में ज्यादा फीचर्स वाले स्मार्टफोन उपलब्ध कराकर बाजार में अपनी पहचान बनाती रही हैं। बजट स्मार्टफोन में कंपनियों का मुनाफा पहले से ही सीमित रहता है। ऐसे में मेमोरी चिप महंगी होने के बाद उनके लिए पुराने दाम पर फोन बेचना मुश्किल हो गया है।
कंपनियों के सामने दो विकल्प हैं। पहला, स्मार्टफोन की कीमत बढ़ाई जाए और दूसरा, फोन के फीचर्स में कटौती करके उत्पादन लागत को नियंत्रित किया जाए। दोनों ही स्थितियों में ग्राहकों की पसंद प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि कई चीनी कंपनियां अपने सस्ते स्मार्टफोन मॉडल कम कर रही हैं और मिड-रेंज तथा प्रीमियम श्रेणी के उपकरणों पर अधिक ध्यान दे रही हैं। The Economic Times +1
चीनी कंपनियों की घटती हिस्सेदारी के बीच भारतीय स्मार्टफोन ब्रांडों के लिए नए अवसर सामने आए हैं। काउंटरपॉइंट रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय ब्रांडों की संयुक्त बाजार हिस्सेदारी पिछले वर्ष की समान तिमाही के लगभग 2 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर 2026 में 7 प्रतिशत तक पहुंच गई।
यह घरेलू कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वर्ष 2018 के अंतिम महीनों के बाद भारतीय ब्रांडों की यह सबसे मजबूत बाजार हिस्सेदारी मानी जा रही है।
इस बढ़त में लावा (Lava) और Ai+ की प्रमुख भूमिका बताई जा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय ब्रांडों के कुल योगदान में इन दोनों कंपनियों की हिस्सेदारी लगभग 95 प्रतिशत रही। इसके अलावा Mivi और Boltt जैसे नए नाम भी इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
Ai+ ने जुलाई 2025 में स्मार्टफोन बाजार में प्रवेश किया था। सितंबर 2026 में समाप्त तिमाही में कंपनी के स्मार्टफोन शिपमेंट में सालाना आधार पर चार गुना से अधिक वृद्धि दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि नए ब्रांड भी भारतीय ग्राहकों के बीच अपनी जगह बनाने में सफल हो सकते हैं।
भारतीय कंपनियां उन ग्राहकों को ध्यान में रख रही हैं, जो सीमित बजट में बेहतर बैटरी, अच्छा कैमरा, पर्याप्त स्टोरेज और उपयोगी फीचर्स वाला फोन खरीदना चाहते हैं।
भारतीय बाजार में बदलाव का लाभ सिर्फ घरेलू कंपनियों को ही नहीं मिल रहा है। दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग और अमेरिकी कंपनी एप्पल भी इस स्थिति में अपनी बाजार मौजूदगी मजबूत कर रही हैं।
सैमसंग ने सितंबर 2026 की तिमाही में नौ तिमाहियों के बाद एक बार फिर भारतीय स्मार्टफोन बाजार में पहला स्थान हासिल किया। काउंटरपॉइंट रिसर्च के अनुसार, कंपनी की बाजार हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत रही।
वहीं एप्पल ने प्रीमियम स्मार्टफोन सेगमेंट में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी है। बेहतर कैमरा, प्रोसेसर, सॉफ्टवेयर अनुभव और ब्रांड वैल्यू के कारण महंगे स्मार्टफोन खरीदने वाले ग्राहकों के बीच कंपनी की लोकप्रियता बनी हुई है।
इससे स्पष्ट है कि भारतीय स्मार्टफोन बाजार में प्रतिस्पर्धा अब केवल कम कीमत और अधिक फीचर्स तक सीमित नहीं रह गई है। ग्राहक फोन खरीदते समय ब्रांड की विश्वसनीयता, सर्विस नेटवर्क और लंबे समय तक सॉफ्टवेयर अपडेट जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दे रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारतीय स्मार्टफोन बाजार खुद आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है। जुलाई से सितंबर 2026 की तिमाही में स्मार्टफोन की कुल शिपमेंट में पिछले वर्ष की तुलना में भारी गिरावट दर्ज की गई।
काउंटरपॉइंट रिसर्च के अनुसार, इस दौरान स्मार्टफोन शिपमेंट में सालाना आधार पर 20 प्रतिशत की कमी आई। वहीं ओमडिया ने लगभग 26 प्रतिशत गिरावट का अनुमान लगाया और कुल शिपमेंट 3.58 करोड़ यूनिट बताया। दोनों कंपनियों के आंकड़ों में अंतर उनकी रिसर्च पद्धति और अनुमान के कारण हो सकता है।
सबसे अधिक दबाव 20 हजार रुपये से कम कीमत वाले स्मार्टफोन सेगमेंट में दिखाई दिया। काउंटरपॉइंट के मुताबिक, इस श्रेणी में शिपमेंट 47 प्रतिशत तक कम हुई। इसकी प्रमुख वजह बढ़ती कीमतें और ग्राहकों की कमजोर खरीदारी क्षमता रही। Omdia +1
इसका मतलब है कि भारतीय कंपनियों को बढ़ती बाजार हिस्सेदारी के बावजूद एक ऐसे बाजार में काम करना पड़ रहा है, जहां ग्राहक नया स्मार्टफोन खरीदने का फैसला टाल रहे हैं।
भारतीय स्मार्टफोन कंपनियों के सामने इस समय बड़ा अवसर जरूर है, लेकिन इस अवसर को स्थायी सफलता में बदलना आसान नहीं होगा। चीन की कंपनियों के पास वर्षों का अनुभव, मजबूत सप्लाई चेन, बड़े पैमाने पर उत्पादन और तकनीकी अनुसंधान की क्षमता मौजूद है।
इसके मुकाबले भारतीय कंपनियों को अभी कई क्षेत्रों में अपनी क्षमता विकसित करनी होगी। इनमें बेहतर कैमरा तकनीक, प्रोसेसर का अनुकूलन, सॉफ्टवेयर अपडेट, मजबूत सर्विस नेटवर्क और देशभर में बिक्री केंद्रों का विस्तार शामिल है।
ग्राहकों का भरोसा जीतना भी घरेलू कंपनियों के लिए बेहद जरूरी होगा। सिर्फ कम कीमत पर स्मार्टफोन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई ग्राहक 10 से 15 हजार रुपये खर्च करके मोबाइल खरीदता है, तो वह चाहता है कि उसका फोन कम से कम दो से तीन वर्षों तक अच्छी तरह काम करे।
भारतीय ब्रांडों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता और बिक्री के बाद मिलने वाली सेवाओं पर विशेष ध्यान देना होगा। इसके अलावा तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी और स्थानीय स्तर पर अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना भी जरूरी है।
स्मार्टफोन बाजार में घरेलू ब्रांडों की बढ़ती हिस्सेदारी भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण क्षेत्र के लिए भी महत्वपूर्ण है। देश में मोबाइल फोन का उत्पादन लगातार बढ़ा है, लेकिन भारतीय बाजार में बिकने वाले फोन का निर्माण भारत में होना और किसी ब्रांड का भारतीय स्वामित्व होना दो अलग-अलग बातें हैं।
कई विदेशी कंपनियां भी भारत में मोबाइल फोन का निर्माण कर रही हैं। इसलिए घरेलू ब्रांडों की हिस्सेदारी बढ़ने के साथ-साथ देश में चिप डिजाइन, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, अनुसंधान और तकनीकी विकास को मजबूत करना भी आवश्यक है।
यदि भारतीय कंपनियां केवल फोन की असेंबलिंग तक सीमित न रहकर डिजाइन, सॉफ्टवेयर और तकनीकी नवाचार में भी आगे बढ़ती हैं, तो भारत वैश्विक स्मार्टफोन उद्योग में अपनी अलग पहचान बना सकता है।
बाजार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सीधा असर मोबाइल खरीदने वाले ग्राहकों पर भी पड़ सकता है। आने वाले समय में कंपनियां ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए नए ऑफर, एक्सचेंज बोनस, बेहतर फाइनेंसिंग और किफायती स्मार्टफोन पेश कर सकती हैं।
हालांकि, मेमोरी चिप और अन्य कंपोनेंट की कीमतों में तेजी बनी रहने पर मोबाइल फोन महंगे भी हो सकते हैं। ऐसे में ग्राहकों को सिर्फ ब्रांड देखकर नहीं, बल्कि फोन की वास्तविक जरूरत, परफॉर्मेंस, बैटरी, कैमरा और सर्विस सपोर्ट के आधार पर खरीदारी करनी चाहिए।
भारत के स्मार्टफोन बाजार में आठ वर्षों बाद चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी का इस स्तर तक गिरना एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। दूसरी तरफ लावा और Ai+ जैसे भारतीय ब्रांडों का 7 प्रतिशत हिस्सेदारी तक पहुंचना घरेलू कंपनियों के लिए उत्साहजनक संकेत है।
लेकिन यह अभी भारतीय कंपनियों की अंतिम जीत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारतीय ब्रांड इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी बाजार हिस्सेदारी लगातार बढ़ा पाते हैं या फिर चीनी कंपनियां नए मॉडल और प्रतिस्पर्धी कीमतों के साथ दोबारा मजबूत वापसी करती हैं।
फिलहाल इतना तय है कि भारतीय स्मार्टफोन बाजार में मुकाबला पहले से ज्यादा दिलचस्प हो चुका है और इसका सबसे बड़ा फायदा ग्राहकों को बेहतर विकल्प मिलने के रूप में हो सकता है।