2024 का लोकसभा चुनाव क्या ‘चोरी’ हुआ था? विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित रैली में यह आरोप लगाकर देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। राहुल गांधी का दावा है कि 2024 का लोकसभा चुनाव निष्पक्ष नहीं था और चुनाव आयोग ने करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए। उन्होंने चुनाव में एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच वोटों के अंतर का हवाला देते हुए चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाए। हालांकि, इस पूरे दावे को समझने के लिए दोनों आंकड़ों की पृष्ठभूमि और उनके समय को अलग-अलग देखना जरूरी है।
सबसे पहले 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों की बात करें तो एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच वोट प्रतिशत का अंतर वास्तव में करीब तीन प्रतिशत के आसपास था। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार, एनडीए को लगभग 44 प्रतिशत और इंडिया गठबंधन को करीब 41 प्रतिशत वोट मिले थे। इस लिहाज से दोनों गठबंधनों के बीच मत प्रतिशत का अंतर बहुत बड़ा नहीं था। राहुल गांधी ने इसी अंतर को अपनी दलील का आधार बनाया है। उनका कहना है कि जब दोनों गठबंधनों के बीच मुकाबला इतना करीबी था, तब मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
दूसरी ओर, करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आंकड़ा भी चर्चा में है। चुनाव आयोग ने 2025 में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया शुरू की थी। इस प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग कारणों से बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। इनमें मृत मतदाता, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोग, दोहरी प्रविष्टियां और अन्य कारणों से अयोग्य पाए गए नाम शामिल हो सकते हैं। आयोग की ओर से जारी आंकड़ों में हटाए गए नामों की संख्या करीब 13 करोड़ बताई गई है।
लेकिन इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल इन दोनों आंकड़ों के समय का है। 2024 के लोकसभा चुनाव और 2025 में शुरू हुई एसआईआर प्रक्रिया के बीच स्पष्ट अंतर है। जिन नामों को 2025 में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान हटाया गया, वे 2024 के चुनाव के समय मतदाता सूची में मौजूद थे। यानी इन नामों को हटाने की कार्रवाई लोकसभा चुनाव के बाद हुई। ऐसे में 2025 में हटाए गए नामों की संख्या को सीधे 2024 के चुनाव में कथित गड़बड़ी का प्रमाण बताना तार्किक रूप से सही नहीं होगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो यह गंभीर मामला है। इसी तरह विपक्ष को भी चुनावी प्रक्रिया में किसी गड़बड़ी का संदेह होने पर सवाल उठाने और सबूत मांगने का अधिकार है। लेकिन किसी आरोप को साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि संबंधित कार्रवाई कब हुई, उसका चुनाव पर क्या प्रभाव पड़ा और क्या उससे मतदान की निष्पक्षता प्रभावित हुई।
यहां दो अलग-अलग तथ्यों को एक साथ रखकर निष्कर्ष निकालने का जोखिम है। पहला तथ्य है कि 2024 में एनडीए और इंडिया गठबंधन के वोट प्रतिशत में लगभग तीन प्रतिशत का अंतर था। दूसरा तथ्य है कि 2025 में एसआईआर के दौरान करीब 13 करोड़ नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए। दोनों आंकड़े अपने-अपने संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन केवल इन दोनों को जोड़ देने से यह साबित नहीं होता कि 2024 का लोकसभा चुनाव चोरी हुआ था।
राहुल गांधी के आरोपों के समर्थन में यदि यह दावा किया जा रहा है कि 2024 के चुनाव में मतदाता सूची के साथ छेड़छाड़ हुई थी, तो उसके लिए 2024 की मतदाता सूची, उस समय हटाए गए नामों, मतदान केंद्रों के आंकड़ों और चुनाव आयोग के रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी। वहीं, 2025 की एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े सवालों का जवाब अलग से दिया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में चुनाव की विश्वसनीयता सबसे अहम है। इसलिए चुनाव आयोग को मतदाता सूची में बदलाव की पूरी जानकारी सार्वजनिक और पारदर्शी तरीके से उपलब्ध करानी चाहिए। विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य सामने रखने चाहिए। फिलहाल उपलब्ध दोनों आंकड़ों से यह तो स्पष्ट होता है कि 2024 में मुकाबला करीबी था और 2025 में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए, लेकिन इन तथ्यों के आधार पर अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि 2024 का लोकसभा चुनाव चोरी हुआ था।